चुनावी मौसम है और चुनावी वादों का बोल बाला है, ऐसा नहीं है की ये नया है, ये वर्षों से चली आ रही प्रथा है कह सकते हैं, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए कोई भी पार्टी कोई भी वादे करने को तत्पर रहती है, ये एक ऐसा हथकण्डा है जिसे कोई भी उपयोग कर सकता है, और जनता भी भली भांति जानती है की चुनाव है तो नेता वादे तो करेंगे ही, इसमें नया क्या है, तो प्रायः देखा ये जाता है की जनता भी इन वादों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती और वोट देते समय अपनी जाति, अपने रिश्तेदार, अपने करीबी को ही वोट देकर चला आता है, और ये % कम से कम ५० % का रहता है, वादे याद रहते हैं, तो सिर्फ विपक्षी दलों को और वो भी जीते हुए दल के।
बचे हुए ५० % लोग जो की चुनावी मुद्दों और वादों पर वोट देते हैं, अक्सर मायूस होते हैं क्योंकि वो राजनितिक दल जो जीत कर आते है, सत्ता में आने के बाद उनकी प्राथमिकता बदल जाती है और फिर ५ साल वो वही करते हैं, जो जिससे उनको और उनके कुनबे को फयदा पहुंचा सके। लेकिन समय बदला है और कुछ ऐसे भी राजनेता आये हैं जिन्होंने लीक से हट कर कुछ करने की सोची है, लेकिन चुनावी वादों को शत प्रतिशत पूरा कर पाने में वो भी असफल हुए हैं, जो वास्तव में व्यावहारिक नहीं था और या तो जो इतने कम समय में कर पाना संभव नहीं था।
तो प्रश्न ये उठता है की क्या इन राजनितिक दलों को इस बात की जानकारी नहीं थी क्या ? क्या उन्हें इतनी भी समझ नहीं की वो जो झूठे वादे कर रहे हैं वो पूरे नहीं हो सकते ? इन सब सवालों का जवाब कौन देगा, आज जब सोशल मीडिया का युग है, जहाँ सब को एक छोटी से छोटी चीज का भी जवाब देना होता है, तो इतने बड़े सवाल का जवाब ये राजनितिक दल कैसे नहीं देंगे?
इसी सवाल के जवाब की खोज में कुछ दिन पहले एक याची जब प्रयागराज हाई कोर्ट पंहुचा तो खंडपीठ ने कहा है कि "कोर्ट अन्तर्निहित शक्तियों का प्रयोग ऐसी याचिकाओं पर नहीं कर सकती। ऐसी याचिका प्रचार के लिए दाखिल की गई है यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। शीर्ष कोर्ट ने भी हाईकोर्ट में बढ़ते मुकदमों की संख्या के लिए व्यर्थ की याचिकाओं को सुनवाई के लिए स्वीकार करने को इसका कारण माना है और कहा है कि व्यर्थ की याचिकाओं पर भारी हर्जाना लगाकर हतोत्साहित किया जाना चाहिए" , अब प्रश्न ये उठता है की जब हाई कोर्ट जैसे संस्था ये कहती है की वो चुनावी वादों पर संज्ञान नहीं ले सकती है तो कम से कम ये तो बता ही सकती है आखिर वो कौन सा फोरम है जहाँ पर जाकर आम जनता अपने सवालों का जवाब मांग सके? क्योंकि जानकारी के मुताबिक ऐसी कोई संस्था नहीं है जो की इन सवालों का जवाब दे सके, अब अगर हाई कोर्ट जैसी संस्था भी राजनितिक दलों से उनके किये हुए वादों का जवाब नहीं मांग सकती और जवाब मांगने वालों को हतोत्साहित करने को कहती है तो जवाब कौन देगा ? क्या जनता को उनके सवालों का जवाब कभी नहीं मिलेंगे? हर ५ साल में सरकार बदलने से वादे तो पूरे नहीं होते ? और अगर ५ साल में वादे पूरे न होने पर सरकार बदल भी जाये तो इसमें राजनितिक दलों का क्या नुक्सान ? वो तो अपनी राजनीती करते ही रहेंगे। और जनता के सवाल अधूरे के अधूरे रह जायेंगे
राजनितिक दलों के चुनावी वादों पर सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेना चाइये और ये सुनिश्चित करना चाहिए की जब कोई राजनितिक दाल कोई वादा करे तो उसे पूरा करे, अन्यथा उसके नेता को गंभीर न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़े और जवाब देना पड़े की आखिर वादे पूरे क्यों नहीं हुए, बाबत जनता को सवाल पूछने से हतोत्साहित किया जाए।
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