आजकल प्रायः
देखा गया है की जैसे ही कोई ह्रदय विदारक घटना समाज में होती है तो हमारे भारतीय लोकतंत्र
का चौथा स्तम्भ प्रेस जिसे मीडिया भी कहा जाता है अपने कैमरे लेकर सड़कों पर आ जाते
हैं और उस घटना या मुद्दे को इस प्रकार से प्रसारित करने लगते हैं जैसे की वह घटना
पहली बार हुई हो और उसके लिए जो भी दोषी हो
उसे उसी वक़्त २४ घंटे के भीतर सजा दे दी जाती है जिसके लिए न ही किसी तंत्र की जरुरत
होती है और न ही किसी न्यायालय की और वैसे भी आजकल तो मीडिया ट्रायल का जमाना है, नो
इफ नो बट फैसला ओन स्पॉट, ये तथाकथित मीडिया जो उसी सिस्टम का हिस्सा होते हैं अचानक वही उसी सिस्टम से अपने आप को अलग कर
लेता है और उसी सिस्टम को दोषी ठहरने लगता है|
ऐसा नहीं
है की ये सब इसलिए होता है की मीडिया को अचानक से समाज की फिक्र होने लगती है बल्कि
उसका मुख्य कारण है उनकी TRP जो की इन्ही सब घटनाओं पर घटती बढाती रहती है और शयद एक
यही चीज है जो उन्हें मुख्य विषय से भटकाता है और सिर्फ उन्हें उसी घटना विशेष पर केंद्रित
रखता है जो की आज के समय में एक चिंता का विषय है|
उधारण
के तौर पर लिया जाये तो राम रहीम बाबा जिसकी बनायीं गयी फिल्म का पूरा प्रोपेगेंडा
मीडिया ने किया था उसने ही बैकग्राउंड चेक
के राम रहीम का माहिम मंडन किया था जब की पिछले १५ सालों से उसके ऊपर रेप का मुक़द्द्मा
चला रहा था तब किसी मीडिया हाउस ने जहमत नहीं उठायी की वो राम रहीम की सल्तनत में जाये
और उसका भांडा फोड़ करे लेकिन जैसे मीडिया को भरपूर मसाला मिला शुरू हो गए कैमरा लेकर
की पहले मै पहले मै , किसी ने भी १५ सालो सा चल रही महिलाओं पर अत्याचार की कहानी नहीं
दिखाई क्योंकि उनकी TRP नहीं बढ़ती क्योंकि देखा जाये तो देश में हर साल १००० महिलाओं के साथ बलातकार होते है जब तक कोई सनसनी हो खबर दिखने का क्या फायदा ?
अभी हाल
की तरोताज़ा दिल को दहला देने वाली घटना जिसमे एक ७ साल के बच्चे की हत्या कर दी गयी
तथ्यों का पता तो नहीं चला लेकिन की कर्मचारी ने जुर्म कबूल कर लिया है, बेशक़ इस घटना
के लिए स्कूल प्रशाशन पूरी तरह से जिम्मेदार है और जिस तरह से स्कूल प्रशाशन अभिभावको
का शोषण करता है उसके बदले कम से कम बच्चो को सुरक्षा तो दे ही सकता है लकिन फेल रहा
? लेकिन मेरा प्रश्न सिर्फ यहीं नहीं ख़तम होता क्या इन मीडिया हाउसेस की ये जिम्मेदारी
नहीं थी वो भारत के विभिन स्कूलों की समस्याओं सा अवगत कराये ये तो फिर भी बहुत है
जितना इन प्राइवेट स्कूलों ने उपलब्ध करवाया है अगर आप किसी सरकारी स्कूल की चौखट पर
कदम रखें तो आप को लगेगा ही नहीं की आप ने किसी स्कूल में कदम रखा है शौचालयों की बात
तो दूर है वहां आपको क्लास रूम भी नहीं मिलेंगे लेकिन शायद अगर मीडिया हाउस सरकारी
स्कूलों की रपट करेंगे तो उनकी TRP टररररररररर हो जाएगी और बिना TRP के मीडिया हाउस
कहाँ चलते हैं साहब ? अब इन प्राइवेट स्कूल की रिपोर्टिंग की है शायद दर स्कूल वाले
ही कुछ आमदनी करा दें |
अब समय है की जब समस्त मीडिया हाउसेस को जिम्मेदारी
का एहसास होना चाहिए और पूरी जिम्मेदारी के साथ समाज के अंदर पल रही उन समस्याओं को
उजागर करना चाहिए जिनके वजह से समस्यांए पैदा
हो रही हैं , प्रहार करना ही है तो समस्याओं की जड़ पर करे न की हो रही घटनाओं पर क्योँकि एक
बार जो घटना हो गयी फिर सिस्टम है उस पर खानापूर्ति
करने के लिए फिर आप सड़क पर खड़े होकर कितना भी क्यों न चिल्ला ले हाँथ कुछ भी नहीं आना
है
अब मीडिया
को गाहेबगाहे समाज में पल रही कुरीतियों, कुसंगतियों, असहिष्णुता , असमानता, अशिक्छा
, कुंठित मानसिकता पर सरकारों पर किसी घटना होने के पहले ही चाबुक चलते रहना पड़ेगा,
सरकारों को उनकी कुम्भकर्णीय निंद्रा से उठते रहना होगा, नहीं तो शायद आपने वो कहावत
तो सुनी ही होगी की समय निकल जाने के बाद ढपली पीटने से क्या मिल जायेगा.
