सामाजिक पतन या
प्रशासनिक विफलता
आजकल एक फैशन सा निकल गया है जैसे ही कोई दुर्घटना होती हिअ वैसे ही हम, हमारा मीडिया, हमरा सोशल मीडिया हम सब मिल कर हल्ला मचने लगते हैं की इस देश में कुछ भी अच्छा नहीं है, पूरा शासन भ्रस्ट हो गया है,कैसे भारत २1वी सदी का भारत बन पायेगा जब हर दिन ना जाने कितनी महिलाओं का शासन होता है रपे होता है, महिलाएं सेफ नहीं हैं और न जाने किनते ही सवाल एक साथ थोप दिए हैं और सच पूछिए तो किसी को भी इन जवाब से कोई मतलब नहीं होता है क्योंकि दो दिन बाद ही सारे के सारे अपने अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं या बोल कर की हम ने एक बार ५ सालों के लिए वोट डाला है और अब समाज में हो रही किसी भी समस्या के प्रत्यछ या परोक्छा रूप सा सहकार ही जिम्मेदार है!
क्या कभी हम
लोंगो ने
समाज में
हो रही
इन दुर्घटनाओं
का विश्लेषण
किया है
की आखिर
ऐसी घटनाएं
हो क्यों
रही है,
क्यों किसी
स्कूल के
अंदर कोई
भी व्यक्ति
जाकर एक
छोटे से
मासूम बच्चे
की हत्या
कर देता
है और
कुछ ही
समय में
आकर ये
भी कह
लेता है
की मैंने
उसके साथ
जबरदस्ती करने
की कोशिश
की और
सफल न
होने पर
हत्या कर
दी ?
कैसे समाज का
एक बड़ा
तबका किसी
ढोंगी बाबा
को अपना
सब कुछ
दे देता
है यहाँ
तक की
अपने घर
की इज्जत
भी और
उसके खिलाफ
कोई नहीं
बोल पता
और जैसे
ही कोर्ट
ने दोषी
ठहराया पूरा
का पूरा
बुद्धिजीवी वर्ग
ज़िंदा हो
गया उसे
गलत या
सही ठहरने
के लिए
?
कैसे एक ५
साल
की बच्ची
के साथ
कोई आदमी
रेप कर
सकता है
?
कैसे समाज का
एक वर्ग
सिर्फ और
सिर्फ सरकार
के विरोध
मात्र के
लिए गाय
जैसी पशु
की निर्मम
हत्या करके
खुले चौराहे
पर अपने
खाने की
आज़ादी की
मांग करता
है ?
कैसे किसी पत्रकार
की हत्या
के बाद
लोग उसे
सिर्फ इस
लिए गालियां
दे कर
उसकी हत्या
को सही
ठहराते हैं
क्योंकि उसने
अपनी अभिब्यक्ति
की आज़ादी
का उपयोग
किया था
और उसके
विचार कुछ
लोगो के
विचार से
नहीं मिलते
हैं ?
क्या हम लोगों
ने सभी
इन सब
अपराधों की
मूल समस्या
पर विचार
किया
है, की
कैसे कोई
किसी ५
साल के
बच्चे या
बच्ची को
बुरी नज़र
से देखता
है फिर
वो उसकी
निर्मम हत्या
भी कर
देता है,
क्या इसके
लिए किसी
सरकार ने
उकसाया था
, कैसे कोई
लड़कियों के
साथ रेप
कर सकता
है, कैसे
कोई ढोंगी
बाबा समाज
के एक
बड़े तबके
को भ्रमित
करके उनके
धन दौलत
और इज्जत
पर डाका
दाल देता
है और
पूरा समाज
मूकदर्शक बना
रहता है
क्या
सरकारे इसके लिए भी उकसाती हैं ?
नहीं दरअसल हमारी सोशल इंजीनियरिंग बिगड़ गयी
है , हमारा सामाजिक तानाबाना इस तरह बिगड़ गया है की लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं की
क्या सही है क्या गलत है, कोई भी विषय पर समाज का दो धड़ा खड़ा हो जाता है और इक दूसरे
को सही या गलत ठहरने की होड़ सी लग जाती है,
हम खुद ही अपनी ही पीढ़ी को कंफ्यूज कर रहे हैं
की क्या सही है और क्या गलत है |हमें जरुरत है अपने समाज में पल रही विसंगतियों
को जड़ से ख़तम करने की, हमें जरुरत है समाज में ये सोच पैदा करने की समाज में रह रहे
सभी लोगों का सामान सम्मान है चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, और हमे ही खुद एक दुसरे
के सम्मान के लिए लड़ना पड़ेगा| समाज में पल रहे अन्धविश्वाश को जड़ ख़तम करने की , एक
दूसरे को आगे बढ़ने का एक सामान अवसर देने का , जरुरत है किसी भी बुराई के साथ एक साथ
लड़ने का|
एक बार अगर हमारे समाज ने खुद ही मदद करने की ठान ली तो सरकारों को तो एक कदम आगे बढ़कर हमारे साथ आने पर विवश होना पड़ेगा लेकिन अगर हम खुद ही उन्ही सामाजिक विसंगतियों के जीने की आदत डाल लेंगे तो माफ कीजिये फिर ऐसे ही किसी दुर्घटना के बाद चिल्लाते रहिये कुछ बदलने वाला नहीं है
आजकल एक फैशन सा निकल गया है जैसे ही कोई दुर्घटना होती हिअ वैसे ही हम, हमारा मीडिया, हमरा सोशल मीडिया हम सब मिल कर हल्ला मचने लगते हैं की इस देश में कुछ भी अच्छा नहीं है, पूरा शासन भ्रस्ट हो गया है,कैसे भारत २1वी सदी का भारत बन पायेगा जब हर दिन ना जाने कितनी महिलाओं का शासन होता है रपे होता है, महिलाएं सेफ नहीं हैं और न जाने किनते ही सवाल एक साथ थोप दिए हैं और सच पूछिए तो किसी को भी इन जवाब से कोई मतलब नहीं होता है क्योंकि दो दिन बाद ही सारे के सारे अपने अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं या बोल कर की हम ने एक बार ५ सालों के लिए वोट डाला है और अब समाज में हो रही किसी भी समस्या के प्रत्यछ या परोक्छा रूप सा सहकार ही जिम्मेदार है!
एक बार अगर हमारे समाज ने खुद ही मदद करने की ठान ली तो सरकारों को तो एक कदम आगे बढ़कर हमारे साथ आने पर विवश होना पड़ेगा लेकिन अगर हम खुद ही उन्ही सामाजिक विसंगतियों के जीने की आदत डाल लेंगे तो माफ कीजिये फिर ऐसे ही किसी दुर्घटना के बाद चिल्लाते रहिये कुछ बदलने वाला नहीं है
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