Wednesday, May 15, 2019
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों...
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों...: चुनावी मौसम है और चुनावी वादों का बोल बाला है, ऐसा नहीं है की ये नया है, ये वर्षों से चली आ रही प्रथा है कह सकते हैं, क्योंकि चुनाव जीतने ...
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों...
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों...: चुनावी मौसम है और चुनावी वादों का बोल बाला है, ऐसा नहीं है की ये नया है, ये वर्षों से चली आ रही प्रथा है कह सकते हैं, क्योंकि चुनाव जीतने ...
चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों न ले संज्ञान
चुनावी मौसम है और चुनावी वादों का बोल बाला है, ऐसा नहीं है की ये नया है, ये वर्षों से चली आ रही प्रथा है कह सकते हैं, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए कोई भी पार्टी कोई भी वादे करने को तत्पर रहती है, ये एक ऐसा हथकण्डा है जिसे कोई भी उपयोग कर सकता है, और जनता भी भली भांति जानती है की चुनाव है तो नेता वादे तो करेंगे ही, इसमें नया क्या है, तो प्रायः देखा ये जाता है की जनता भी इन वादों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती और वोट देते समय अपनी जाति, अपने रिश्तेदार, अपने करीबी को ही वोट देकर चला आता है, और ये % कम से कम ५० % का रहता है, वादे याद रहते हैं, तो सिर्फ विपक्षी दलों को और वो भी जीते हुए दल के।
बचे हुए ५० % लोग जो की चुनावी मुद्दों और वादों पर वोट देते हैं, अक्सर मायूस होते हैं क्योंकि वो राजनितिक दल जो जीत कर आते है, सत्ता में आने के बाद उनकी प्राथमिकता बदल जाती है और फिर ५ साल वो वही करते हैं, जो जिससे उनको और उनके कुनबे को फयदा पहुंचा सके। लेकिन समय बदला है और कुछ ऐसे भी राजनेता आये हैं जिन्होंने लीक से हट कर कुछ करने की सोची है, लेकिन चुनावी वादों को शत प्रतिशत पूरा कर पाने में वो भी असफल हुए हैं, जो वास्तव में व्यावहारिक नहीं था और या तो जो इतने कम समय में कर पाना संभव नहीं था।
तो प्रश्न ये उठता है की क्या इन राजनितिक दलों को इस बात की जानकारी नहीं थी क्या ? क्या उन्हें इतनी भी समझ नहीं की वो जो झूठे वादे कर रहे हैं वो पूरे नहीं हो सकते ? इन सब सवालों का जवाब कौन देगा, आज जब सोशल मीडिया का युग है, जहाँ सब को एक छोटी से छोटी चीज का भी जवाब देना होता है, तो इतने बड़े सवाल का जवाब ये राजनितिक दल कैसे नहीं देंगे?
इसी सवाल के जवाब की खोज में कुछ दिन पहले एक याची जब प्रयागराज हाई कोर्ट पंहुचा तो खंडपीठ ने कहा है कि "कोर्ट अन्तर्निहित शक्तियों का प्रयोग ऐसी याचिकाओं पर नहीं कर सकती। ऐसी याचिका प्रचार के लिए दाखिल की गई है यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। शीर्ष कोर्ट ने भी हाईकोर्ट में बढ़ते मुकदमों की संख्या के लिए व्यर्थ की याचिकाओं को सुनवाई के लिए स्वीकार करने को इसका कारण माना है और कहा है कि व्यर्थ की याचिकाओं पर भारी हर्जाना लगाकर हतोत्साहित किया जाना चाहिए" , अब प्रश्न ये उठता है की जब हाई कोर्ट जैसे संस्था ये कहती है की वो चुनावी वादों पर संज्ञान नहीं ले सकती है तो कम से कम ये तो बता ही सकती है आखिर वो कौन सा फोरम है जहाँ पर जाकर आम जनता अपने सवालों का जवाब मांग सके? क्योंकि जानकारी के मुताबिक ऐसी कोई संस्था नहीं है जो की इन सवालों का जवाब दे सके, अब अगर हाई कोर्ट जैसी संस्था भी राजनितिक दलों से उनके किये हुए वादों का जवाब नहीं मांग सकती और जवाब मांगने वालों को हतोत्साहित करने को कहती है तो जवाब कौन देगा ? क्या जनता को उनके सवालों का जवाब कभी नहीं मिलेंगे? हर ५ साल में सरकार बदलने से वादे तो पूरे नहीं होते ? और अगर ५ साल में वादे पूरे न होने पर सरकार बदल भी जाये तो इसमें राजनितिक दलों का क्या नुक्सान ? वो तो अपनी राजनीती करते ही रहेंगे। और जनता के सवाल अधूरे के अधूरे रह जायेंगे
राजनितिक दलों के चुनावी वादों पर सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेना चाइये और ये सुनिश्चित करना चाहिए की जब कोई राजनितिक दाल कोई वादा करे तो उसे पूरा करे, अन्यथा उसके नेता को गंभीर न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़े और जवाब देना पड़े की आखिर वादे पूरे क्यों नहीं हुए, बाबत जनता को सवाल पूछने से हतोत्साहित किया जाए।
Sunday, May 5, 2019
क्या मतदाता करेंगे अपने विवेक का उपयोग ?
क्या मतदाता करेंगे अपने विवेक का उपयोग ?
अपने मत का प्रयोग करे, मतदान न करे, क्योंकि दान में बाद उस चीज पर आपका अधिकार नहीं रहता है, मत आपका अधिकार है न की कोई वास्तु जो दान कर दी जाये।
चुनाव का आज ५वा चरण है, और बहुत से राजनीती के बाहुबलियों का भविष्य आज मतदाताओं की ऊँगली पर टिका है, देखना ये है की क्या मतदाता आज अपनी ऊँगली का साथ देकर किसे जिताता है और किसे ऊँगली करके और ५ साल तक इंतज़ार करने को मज़बूर करेगा? देखना ये है की क्या इस बार भी मतदाता बड़े-बड़े राजनितिक कद के लोगों को बिना किसी काम किये फिर से अपना मत देकर मूर्खों की जमात में खड़ा होता है ? या फिर अपने विवेक का इस्तेमाल करके उन उम्मीदवारों को उनकी अपनी हैसियत का एहसास करवाता है ? और मतदाता बताएगा की काम करोगे तब ही मत मिलेगा नहीं तो फिर मिलेगा ठेंगा।
१५-१५ सालों से कुछ सीट पर तो कुछ पर ३०-३० साल बड़े बड़े नाम सिर्फ नाम के बल पर और अपनी साख के बल पर एक ही लोकसभा सीट अपनी धाक जमाये रखा है, और जनता को मदारी की तरह अपने डमरू की धप पर नाचते रहे। आश्चर्य होता है की कैसे जनता आखिर एक ही राजनेता को सिर्फ उसके नाम के बल पर दुबारा चुन कर भेज देती है ये जानते हुए की ये नेता फिर ५ साल उस छेत्र में नहीं दिखाई देगा।
अब हालाँकि सोशल नेटवर्किंग का जमाना है जिसका एक पहलु ये है की लोग जागरूक हो चुके हैं, भले ही वो पूरी तरह से अपने आप को इस लोकतंत्र के महा कुम्भ में सम्मलित न कर पा रहे हों लेकिन उन्हें इतनी तो समझ है की उनके लिए क्या सही है और क्या गलत है, बेशक वो अपने वोट देते समय किसी जाति, धर्म, या नाम पर वोट करते हों, लेकिन उन्हें पता तो होता है की वो जो कर ,रहे हैं वो कहीं न कहीं गलत या सही है।
समय है अपनी भागीदारी को और सुढृढ़ करने का, समय है अपने चुनाव को और सशक्त करने का, समय है ये बताने का की अगर आप नेता, अभिनेता, खिलाडी, मदारी जो भी हों अगर आप को वोट चाहिए तो चुनाव के बाद भी ५ साल आपको मतदाता के साथ ही खड़ा रहना पड़ेगा, चुनाव के बाद भी आपको छेत्र का विकास करना पड़ेगा, चुनाव के बाद भी आपको हाँथ जोड़ कर खड़े रहना पड़ेगा, तब ही आज का जागरूक मतदाता आपको वोट देगा
चुनाव है, घर से निकले और अपने मत का प्रयोग करे, मतदान न करे, क्योंकि दान में बाद उस चीज पर आपका अधिकार नहीं रहता है, मत आपका अधिकार है न की कोई वास्तु जो दान कर दी जाये।
चुनाव करे, सही चुने और देश को सशक्त बनाये
अपने मत का प्रयोग करे, मतदान न करे, क्योंकि दान में बाद उस चीज पर आपका अधिकार नहीं रहता है, मत आपका अधिकार है न की कोई वास्तु जो दान कर दी जाये।
चुनाव का आज ५वा चरण है, और बहुत से राजनीती के बाहुबलियों का भविष्य आज मतदाताओं की ऊँगली पर टिका है, देखना ये है की क्या मतदाता आज अपनी ऊँगली का साथ देकर किसे जिताता है और किसे ऊँगली करके और ५ साल तक इंतज़ार करने को मज़बूर करेगा? देखना ये है की क्या इस बार भी मतदाता बड़े-बड़े राजनितिक कद के लोगों को बिना किसी काम किये फिर से अपना मत देकर मूर्खों की जमात में खड़ा होता है ? या फिर अपने विवेक का इस्तेमाल करके उन उम्मीदवारों को उनकी अपनी हैसियत का एहसास करवाता है ? और मतदाता बताएगा की काम करोगे तब ही मत मिलेगा नहीं तो फिर मिलेगा ठेंगा।
१५-१५ सालों से कुछ सीट पर तो कुछ पर ३०-३० साल बड़े बड़े नाम सिर्फ नाम के बल पर और अपनी साख के बल पर एक ही लोकसभा सीट अपनी धाक जमाये रखा है, और जनता को मदारी की तरह अपने डमरू की धप पर नाचते रहे। आश्चर्य होता है की कैसे जनता आखिर एक ही राजनेता को सिर्फ उसके नाम के बल पर दुबारा चुन कर भेज देती है ये जानते हुए की ये नेता फिर ५ साल उस छेत्र में नहीं दिखाई देगा।
अब हालाँकि सोशल नेटवर्किंग का जमाना है जिसका एक पहलु ये है की लोग जागरूक हो चुके हैं, भले ही वो पूरी तरह से अपने आप को इस लोकतंत्र के महा कुम्भ में सम्मलित न कर पा रहे हों लेकिन उन्हें इतनी तो समझ है की उनके लिए क्या सही है और क्या गलत है, बेशक वो अपने वोट देते समय किसी जाति, धर्म, या नाम पर वोट करते हों, लेकिन उन्हें पता तो होता है की वो जो कर ,रहे हैं वो कहीं न कहीं गलत या सही है।
समय है अपनी भागीदारी को और सुढृढ़ करने का, समय है अपने चुनाव को और सशक्त करने का, समय है ये बताने का की अगर आप नेता, अभिनेता, खिलाडी, मदारी जो भी हों अगर आप को वोट चाहिए तो चुनाव के बाद भी ५ साल आपको मतदाता के साथ ही खड़ा रहना पड़ेगा, चुनाव के बाद भी आपको छेत्र का विकास करना पड़ेगा, चुनाव के बाद भी आपको हाँथ जोड़ कर खड़े रहना पड़ेगा, तब ही आज का जागरूक मतदाता आपको वोट देगा
चुनाव है, घर से निकले और अपने मत का प्रयोग करे, मतदान न करे, क्योंकि दान में बाद उस चीज पर आपका अधिकार नहीं रहता है, मत आपका अधिकार है न की कोई वास्तु जो दान कर दी जाये।
चुनाव करे, सही चुने और देश को सशक्त बनाये
Friday, May 3, 2019
वोट कटुवा राजनीति - गठबंधन का फरेब जनता के साथ ?
लोकसभा चुनाव चल रहे हैं, और हर राजनितिक पार्टी चाहती है की वो लोकसभा चुनाव जीते, चाहे वो १ सीट पर चुनाव लड़ रहे हों, या पूरे के पोरे ५४२ सीटों पर। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी पार्टियां लोकसभा में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती हैं, येन-केन-प्रकारेण मतलब किसी भी तरह से अपनी उपस्तिथि दर्ज करनी है।
छोटी-छोटी पार्टियां या निर्दलीय उम्मीदवार तो चुनाव में उतरते ही सिर्फ इस लिए हैं की या तो उन्हें बेवजह की प्रसिद्धि मिल जाये या तो वो किसी ऐसे उम्मीदवार का वोट काट सके और उनका मन-चाहा उम्मीदवार जीत सके, ये सब चुनाव में बहुत आम बात है, या यूँ कह ले की ये आम चुनाव की आम बात है, नहीं बनारस जैसे लोकसभा सीट पर जहाँ विपक्ष का कोई उम्मीदवार हार के डर से नहीं लड़ रहा हो उसी सीट पर करीब करीब १०० से अधिक लोगों ने अपना नामांकन भरा था जिन्हे शायद उनके खुद के मोहल्ले वाले भी नहीं जानते होंगे।
खैर इसमें कोई नया नहीं है, हैरानी तो होती है जब करीब १०० साल से भी पुराणी पार्टी चुनाव में उम्मीदवार सिर्फ वोट काटने के लिए उतरती है ? मतलब राजनीति में राजनितिक पार्टी अब अपने प्रतिद्वंद्वी से सीधे सीधे नहीं लड़ पा रहे हैं तो अब लड़ने की नयी तरकीब निकली है, एक ऐसा गठबंधन किया जाये जो जनता के सामने गठबंधन न लगे, मतलब जनता के सामने तो ये पार्टियां एक दुसरे को गलियां देंगी, और न जाने क्या क्या कहेंगी, लेकिन चुनाव के बाद नतीजा जो भी आये ये सारी पार्टी एक हो जाएगी और गठबंधन का नाम दे देगी।
पूरे चुनाव में विपक्ष इस तरह से कमजोर होकर चुनाव लड़ेगा इसकी अपेक्षा नहीं थी। आलम ये है की विपक्ष इतनी में भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है की एक साथ खड़ा होकर लड़ सके। पता नहीं विपक्ष आम जनता को इतना मूर्ख समझने की मूर्खता कैसे कर सकता है?
जनता को सजग रहने की जरुरत है की वोट किसे कर रहे हैं
वोट करे, और एक सशक्त सरकार चुने
Monday, April 29, 2019
श्रीलंका पर आतंकी हमला क्या भारतियों के लिए चेतावनी ??
विगत २३ अप्रैल को श्रीलंका में एक आतंकी हमला हुआ, जिसमे हज़ारों लोग हताहत हुए और करीब ३२५ लोगों को अपने जान से हाँथ धोना पड़ा, इतना ही नहीं इस भयावह घटना में सिर्फ श्रीलंका ही नहीं अपितु अन्य राष्ट्रों के भी नागरिकों को भी अपने जान से हाँथ धोना पड़ा, जिसमे भारत, पाकिस्तान, अमेरिका, व अन्य राष्ट्र के नागरिक शामिल थे, ऐसा कहा जाता है की इस हमले के पीछे ही कट्टरपंथी सोच वाले आतंकी संघटन का हाँथ था। दशकों से श्रीलंका ने इस तरह की किसी घटना का सामना नहीं किया था, तो आखिर वजह क्या थी ? इतनी बड़ी घटना आखिर घटी कैसे ? कौन है इसके लिए दोषी ?
आतंकी घटना के घाट जाने के बाद अमूमन जैसे की होता आया है राष्ट्र की सुरक्षा एजेंसी ने तहकीकात करनी शरू की तो पता चला की इस घटना की जानकारी तो पहले से ही राष्ट्र के राष्ट्रपति को इस होने वाले आतंकी हमले की जानकारी तो भारत की ओर से दे दी गयी थी ? और इस बाबत श्रीलंका के प्रधानमंत्री को कोई सूचना नहीं दी गयी ? अचंभित कर देने वाली घटना, ये तो उस आतंकी घटना से भी जयादा भयावह थी, जहाँ पर उन्हें होने वाली घटना के बारे में सूचना थी लेकिन उन्होंने कोई ठोस कदम नहीं उठाया ? आखिर क्या वजह थी इसके पीछे ?? प्रश्न बहुत हैं जवाब चाहिए ?
अब बारी आती है इस दुर्घटना की जड़ में जाने की, आपको विदित हो की श्रीलंका में कुछ महीने पहले राजनितिक उथल-पुथल हुई थी, इस राजनितिक उथल-पुथल की वजह से श्रीलंका में गठबंधन की सरकार बनानी पड़ी, नतीजा ये की दो राजनितिक दलों में सत्ता की चाहत में सरकार तो बना ली लेकिन आपसी सहयोग न कर सके जिसके चलते श्रीलंका के लोगों को इतनी बड़ी छति उठानी पड़ी
प्रश्न ये है की आखिर इस राजनितिक उथल-पुथल की आखिर वजह क्या थी ? वजह थे श्रीलंका के अपने लोग, वहां के निवासी, हाँ ये १०० फीसदी सच है। अब आपको ये लग रहा होगा की इसमें बेचारी जनता की गलती? अब सरकारें अपना काम न करे तो जनता क्या कर सकती है ? जनता तो आखिर बेचारी ही होती है। लेकिन गलती है तो सिर्फ जनता की है क्योंकि जब आम चुनाव आये तो उन्होंने एक सशक्त सरकार चुन कर नहीं भेजी जिसका खामियाज़ा आज उसे भुगतना पड़ रहा है।
आज भी समय है हम भारतीयों को श्रीलंका में हुई घटना से सीखना चाइये, हमें इस आम चुनाव में एक ऐसे ससक्त सरकार चुननी है जो की ना सिर्फ देश की तरक्की में अपने आप को पूरी तरह झोंक दे अपितु बाहरी ताकतों से भी देश की सुरक्षा कर सके।
आगे आइये और एक सशक्त सरकार बनाने में अपना सहयोग करे, वोट करे, सही चुने ताकि आपको अपने चुनाव पर गर्व हो सके।
Tuesday, April 23, 2019
दो सीट पर चुनाव लड़ना क्या पैसे की बर्बादी ? जिम्मेदार कौन ?
दो सीट पर चुनाव लड़ना क्या पैसे की बर्बादी ? जिम्मेदार कौन ?
अक्सर लोकसभा हो या विधानसभा की चुनाव होता है तो ये देखा जाता है की कुछ राजनेता एक साथ दो अलग अलग छेत्रों से चुनाव लड़ते हैं, और ऐसा सन्देश देने की कोशिश करते हैं, की वो एक दो छेत्रों का प्रतिनिधित्व करके उस छेत्र की जनता को धन्य कर रहे हैं, या कोई अहसान कर रहे हैं ? एक साथ दो जगह चुनाव लड़ने का क्या औचित्य है? क्या ऐसा करने से वो जनप्रतिनिधि दो छेत्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है अगर वो चुनाव जीत जायेगा ? ऐसे नहीं है जैसे ही कोई नेता एक साथ दो छेत्र से चुनाव जीतता है उसे तुरंत दो में से किसी एक छेत्र का चुनाव करना होता है फिर एक चुनाव छेत्र को छोड़ना पड़ता है, मतलब चुनाव आयोग को चुनाव के तुरंत बाद फिर से उपचुनाव करवाना अनिवार्य है।
यहाँ दो प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, पहला ये की ये जानते हुए की एक उम्मीदवार जो की दो-दो चुनाव छेत्र से चुनाव लड़ रहा है उसे आम जनता मूर्खों की तरह ये जानते हुए भी की चुनाव जीतते ही छोड़ कर चला जायेगा चुनाव की जीत क्यों दिलवा देती है ? क्या आम जनता इतनी मूर्ख है या उसे मूर्ख बनाना इतना आसान है की जो प्रतिनिधि उस छेत्र की जवाबदारी पहले से ही नहीं लेना चाहता है उसे आखिर क्यों अपना वोट देकर जिताया जाये ? आखिर उससे उस छेत्र की जनता को क्या हांसिल होगा ? क्या जनता को इस बात का एहसास है की एक चुनाव के बाद उसे फिर दूसरे उपचुनाव में झोंक दिया जायेगा ? क्या जनता के पास अपने कोई खुद के मुद्दे नहीं होते जिसके आधार पर वो निर्णय करे की उसे किस उम्मीदवार को वोट देना है ? या सिर्फ बहुचर्चित चेहरे के आगे जनता अपने सारे मुद्दे भूल कर गाय-बकरियों की तरह बूथ पर जाकर वोट डाल कर चली आती है ? सोचिये ?
दूसरा सबसे अहम् मुद्दा ये है की क्या उपचुनाव करवाने में देश के पैसों की बर्बादी नहीं होती ? जैसी की जानकारी है की चुनाव आयोग एक बूथ पर लगभग १० लाख रूपये खर्च करती है, और एक बूथ पर १४०० से ज्यादा वोटर्स नहीं हो सकते मतलब एक सीट पर करीब करीब २५० से ज्यादा बूथ २.५ से ३ करोड़ रूपए बर्बाद कर दिए जाते हैं, जैसे ही एक उमीदवार दो सीट से अपनी दावेदारी ठोकता है। क्या चुनाव आयोग ने कभी एक बाबत संज्ञान लिया ?
आवशयकता है चुनाव आयोग को कोई ऐसा नियम बनाये की यदि कोई उम्मीदवार दो सीटों से चुनाव जीतता है और एक सीट छोड़ता है उस उम्मीदवार कोई चुनाव पर हुए खर्च चुनाव आयोग को वापस करने होंगे, साथ ही साथ छेत्र की जनता को भी सजग होना होगा की किसी ऐसे उम्मीदवार को वोट ही क्यों देना जो चुनाव से पहले ही उसका नहीं है।
सही चुने जरूर चुने, चुने जरूर
अक्सर लोकसभा हो या विधानसभा की चुनाव होता है तो ये देखा जाता है की कुछ राजनेता एक साथ दो अलग अलग छेत्रों से चुनाव लड़ते हैं, और ऐसा सन्देश देने की कोशिश करते हैं, की वो एक दो छेत्रों का प्रतिनिधित्व करके उस छेत्र की जनता को धन्य कर रहे हैं, या कोई अहसान कर रहे हैं ? एक साथ दो जगह चुनाव लड़ने का क्या औचित्य है? क्या ऐसा करने से वो जनप्रतिनिधि दो छेत्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है अगर वो चुनाव जीत जायेगा ? ऐसे नहीं है जैसे ही कोई नेता एक साथ दो छेत्र से चुनाव जीतता है उसे तुरंत दो में से किसी एक छेत्र का चुनाव करना होता है फिर एक चुनाव छेत्र को छोड़ना पड़ता है, मतलब चुनाव आयोग को चुनाव के तुरंत बाद फिर से उपचुनाव करवाना अनिवार्य है।
यहाँ दो प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, पहला ये की ये जानते हुए की एक उम्मीदवार जो की दो-दो चुनाव छेत्र से चुनाव लड़ रहा है उसे आम जनता मूर्खों की तरह ये जानते हुए भी की चुनाव जीतते ही छोड़ कर चला जायेगा चुनाव की जीत क्यों दिलवा देती है ? क्या आम जनता इतनी मूर्ख है या उसे मूर्ख बनाना इतना आसान है की जो प्रतिनिधि उस छेत्र की जवाबदारी पहले से ही नहीं लेना चाहता है उसे आखिर क्यों अपना वोट देकर जिताया जाये ? आखिर उससे उस छेत्र की जनता को क्या हांसिल होगा ? क्या जनता को इस बात का एहसास है की एक चुनाव के बाद उसे फिर दूसरे उपचुनाव में झोंक दिया जायेगा ? क्या जनता के पास अपने कोई खुद के मुद्दे नहीं होते जिसके आधार पर वो निर्णय करे की उसे किस उम्मीदवार को वोट देना है ? या सिर्फ बहुचर्चित चेहरे के आगे जनता अपने सारे मुद्दे भूल कर गाय-बकरियों की तरह बूथ पर जाकर वोट डाल कर चली आती है ? सोचिये ?
दूसरा सबसे अहम् मुद्दा ये है की क्या उपचुनाव करवाने में देश के पैसों की बर्बादी नहीं होती ? जैसी की जानकारी है की चुनाव आयोग एक बूथ पर लगभग १० लाख रूपये खर्च करती है, और एक बूथ पर १४०० से ज्यादा वोटर्स नहीं हो सकते मतलब एक सीट पर करीब करीब २५० से ज्यादा बूथ २.५ से ३ करोड़ रूपए बर्बाद कर दिए जाते हैं, जैसे ही एक उमीदवार दो सीट से अपनी दावेदारी ठोकता है। क्या चुनाव आयोग ने कभी एक बाबत संज्ञान लिया ?
आवशयकता है चुनाव आयोग को कोई ऐसा नियम बनाये की यदि कोई उम्मीदवार दो सीटों से चुनाव जीतता है और एक सीट छोड़ता है उस उम्मीदवार कोई चुनाव पर हुए खर्च चुनाव आयोग को वापस करने होंगे, साथ ही साथ छेत्र की जनता को भी सजग होना होगा की किसी ऐसे उम्मीदवार को वोट ही क्यों देना जो चुनाव से पहले ही उसका नहीं है।
सही चुने जरूर चुने, चुने जरूर
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