Wednesday, May 15, 2019
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों...
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों...: चुनावी मौसम है और चुनावी वादों का बोल बाला है, ऐसा नहीं है की ये नया है, ये वर्षों से चली आ रही प्रथा है कह सकते हैं, क्योंकि चुनाव जीतने ...
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों...
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों...: चुनावी मौसम है और चुनावी वादों का बोल बाला है, ऐसा नहीं है की ये नया है, ये वर्षों से चली आ रही प्रथा है कह सकते हैं, क्योंकि चुनाव जीतने ...
चुनावी वादे और उनकी जवाबदेही - सुप्रीम कोर्ट क्यों न ले संज्ञान
चुनावी मौसम है और चुनावी वादों का बोल बाला है, ऐसा नहीं है की ये नया है, ये वर्षों से चली आ रही प्रथा है कह सकते हैं, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए कोई भी पार्टी कोई भी वादे करने को तत्पर रहती है, ये एक ऐसा हथकण्डा है जिसे कोई भी उपयोग कर सकता है, और जनता भी भली भांति जानती है की चुनाव है तो नेता वादे तो करेंगे ही, इसमें नया क्या है, तो प्रायः देखा ये जाता है की जनता भी इन वादों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती और वोट देते समय अपनी जाति, अपने रिश्तेदार, अपने करीबी को ही वोट देकर चला आता है, और ये % कम से कम ५० % का रहता है, वादे याद रहते हैं, तो सिर्फ विपक्षी दलों को और वो भी जीते हुए दल के।
बचे हुए ५० % लोग जो की चुनावी मुद्दों और वादों पर वोट देते हैं, अक्सर मायूस होते हैं क्योंकि वो राजनितिक दल जो जीत कर आते है, सत्ता में आने के बाद उनकी प्राथमिकता बदल जाती है और फिर ५ साल वो वही करते हैं, जो जिससे उनको और उनके कुनबे को फयदा पहुंचा सके। लेकिन समय बदला है और कुछ ऐसे भी राजनेता आये हैं जिन्होंने लीक से हट कर कुछ करने की सोची है, लेकिन चुनावी वादों को शत प्रतिशत पूरा कर पाने में वो भी असफल हुए हैं, जो वास्तव में व्यावहारिक नहीं था और या तो जो इतने कम समय में कर पाना संभव नहीं था।
तो प्रश्न ये उठता है की क्या इन राजनितिक दलों को इस बात की जानकारी नहीं थी क्या ? क्या उन्हें इतनी भी समझ नहीं की वो जो झूठे वादे कर रहे हैं वो पूरे नहीं हो सकते ? इन सब सवालों का जवाब कौन देगा, आज जब सोशल मीडिया का युग है, जहाँ सब को एक छोटी से छोटी चीज का भी जवाब देना होता है, तो इतने बड़े सवाल का जवाब ये राजनितिक दल कैसे नहीं देंगे?
इसी सवाल के जवाब की खोज में कुछ दिन पहले एक याची जब प्रयागराज हाई कोर्ट पंहुचा तो खंडपीठ ने कहा है कि "कोर्ट अन्तर्निहित शक्तियों का प्रयोग ऐसी याचिकाओं पर नहीं कर सकती। ऐसी याचिका प्रचार के लिए दाखिल की गई है यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। शीर्ष कोर्ट ने भी हाईकोर्ट में बढ़ते मुकदमों की संख्या के लिए व्यर्थ की याचिकाओं को सुनवाई के लिए स्वीकार करने को इसका कारण माना है और कहा है कि व्यर्थ की याचिकाओं पर भारी हर्जाना लगाकर हतोत्साहित किया जाना चाहिए" , अब प्रश्न ये उठता है की जब हाई कोर्ट जैसे संस्था ये कहती है की वो चुनावी वादों पर संज्ञान नहीं ले सकती है तो कम से कम ये तो बता ही सकती है आखिर वो कौन सा फोरम है जहाँ पर जाकर आम जनता अपने सवालों का जवाब मांग सके? क्योंकि जानकारी के मुताबिक ऐसी कोई संस्था नहीं है जो की इन सवालों का जवाब दे सके, अब अगर हाई कोर्ट जैसी संस्था भी राजनितिक दलों से उनके किये हुए वादों का जवाब नहीं मांग सकती और जवाब मांगने वालों को हतोत्साहित करने को कहती है तो जवाब कौन देगा ? क्या जनता को उनके सवालों का जवाब कभी नहीं मिलेंगे? हर ५ साल में सरकार बदलने से वादे तो पूरे नहीं होते ? और अगर ५ साल में वादे पूरे न होने पर सरकार बदल भी जाये तो इसमें राजनितिक दलों का क्या नुक्सान ? वो तो अपनी राजनीती करते ही रहेंगे। और जनता के सवाल अधूरे के अधूरे रह जायेंगे
राजनितिक दलों के चुनावी वादों पर सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेना चाइये और ये सुनिश्चित करना चाहिए की जब कोई राजनितिक दाल कोई वादा करे तो उसे पूरा करे, अन्यथा उसके नेता को गंभीर न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़े और जवाब देना पड़े की आखिर वादे पूरे क्यों नहीं हुए, बाबत जनता को सवाल पूछने से हतोत्साहित किया जाए।
Sunday, May 5, 2019
क्या मतदाता करेंगे अपने विवेक का उपयोग ?
क्या मतदाता करेंगे अपने विवेक का उपयोग ?
अपने मत का प्रयोग करे, मतदान न करे, क्योंकि दान में बाद उस चीज पर आपका अधिकार नहीं रहता है, मत आपका अधिकार है न की कोई वास्तु जो दान कर दी जाये।
चुनाव का आज ५वा चरण है, और बहुत से राजनीती के बाहुबलियों का भविष्य आज मतदाताओं की ऊँगली पर टिका है, देखना ये है की क्या मतदाता आज अपनी ऊँगली का साथ देकर किसे जिताता है और किसे ऊँगली करके और ५ साल तक इंतज़ार करने को मज़बूर करेगा? देखना ये है की क्या इस बार भी मतदाता बड़े-बड़े राजनितिक कद के लोगों को बिना किसी काम किये फिर से अपना मत देकर मूर्खों की जमात में खड़ा होता है ? या फिर अपने विवेक का इस्तेमाल करके उन उम्मीदवारों को उनकी अपनी हैसियत का एहसास करवाता है ? और मतदाता बताएगा की काम करोगे तब ही मत मिलेगा नहीं तो फिर मिलेगा ठेंगा।
१५-१५ सालों से कुछ सीट पर तो कुछ पर ३०-३० साल बड़े बड़े नाम सिर्फ नाम के बल पर और अपनी साख के बल पर एक ही लोकसभा सीट अपनी धाक जमाये रखा है, और जनता को मदारी की तरह अपने डमरू की धप पर नाचते रहे। आश्चर्य होता है की कैसे जनता आखिर एक ही राजनेता को सिर्फ उसके नाम के बल पर दुबारा चुन कर भेज देती है ये जानते हुए की ये नेता फिर ५ साल उस छेत्र में नहीं दिखाई देगा।
अब हालाँकि सोशल नेटवर्किंग का जमाना है जिसका एक पहलु ये है की लोग जागरूक हो चुके हैं, भले ही वो पूरी तरह से अपने आप को इस लोकतंत्र के महा कुम्भ में सम्मलित न कर पा रहे हों लेकिन उन्हें इतनी तो समझ है की उनके लिए क्या सही है और क्या गलत है, बेशक वो अपने वोट देते समय किसी जाति, धर्म, या नाम पर वोट करते हों, लेकिन उन्हें पता तो होता है की वो जो कर ,रहे हैं वो कहीं न कहीं गलत या सही है।
समय है अपनी भागीदारी को और सुढृढ़ करने का, समय है अपने चुनाव को और सशक्त करने का, समय है ये बताने का की अगर आप नेता, अभिनेता, खिलाडी, मदारी जो भी हों अगर आप को वोट चाहिए तो चुनाव के बाद भी ५ साल आपको मतदाता के साथ ही खड़ा रहना पड़ेगा, चुनाव के बाद भी आपको छेत्र का विकास करना पड़ेगा, चुनाव के बाद भी आपको हाँथ जोड़ कर खड़े रहना पड़ेगा, तब ही आज का जागरूक मतदाता आपको वोट देगा
चुनाव है, घर से निकले और अपने मत का प्रयोग करे, मतदान न करे, क्योंकि दान में बाद उस चीज पर आपका अधिकार नहीं रहता है, मत आपका अधिकार है न की कोई वास्तु जो दान कर दी जाये।
चुनाव करे, सही चुने और देश को सशक्त बनाये
अपने मत का प्रयोग करे, मतदान न करे, क्योंकि दान में बाद उस चीज पर आपका अधिकार नहीं रहता है, मत आपका अधिकार है न की कोई वास्तु जो दान कर दी जाये।
चुनाव का आज ५वा चरण है, और बहुत से राजनीती के बाहुबलियों का भविष्य आज मतदाताओं की ऊँगली पर टिका है, देखना ये है की क्या मतदाता आज अपनी ऊँगली का साथ देकर किसे जिताता है और किसे ऊँगली करके और ५ साल तक इंतज़ार करने को मज़बूर करेगा? देखना ये है की क्या इस बार भी मतदाता बड़े-बड़े राजनितिक कद के लोगों को बिना किसी काम किये फिर से अपना मत देकर मूर्खों की जमात में खड़ा होता है ? या फिर अपने विवेक का इस्तेमाल करके उन उम्मीदवारों को उनकी अपनी हैसियत का एहसास करवाता है ? और मतदाता बताएगा की काम करोगे तब ही मत मिलेगा नहीं तो फिर मिलेगा ठेंगा।
१५-१५ सालों से कुछ सीट पर तो कुछ पर ३०-३० साल बड़े बड़े नाम सिर्फ नाम के बल पर और अपनी साख के बल पर एक ही लोकसभा सीट अपनी धाक जमाये रखा है, और जनता को मदारी की तरह अपने डमरू की धप पर नाचते रहे। आश्चर्य होता है की कैसे जनता आखिर एक ही राजनेता को सिर्फ उसके नाम के बल पर दुबारा चुन कर भेज देती है ये जानते हुए की ये नेता फिर ५ साल उस छेत्र में नहीं दिखाई देगा।
अब हालाँकि सोशल नेटवर्किंग का जमाना है जिसका एक पहलु ये है की लोग जागरूक हो चुके हैं, भले ही वो पूरी तरह से अपने आप को इस लोकतंत्र के महा कुम्भ में सम्मलित न कर पा रहे हों लेकिन उन्हें इतनी तो समझ है की उनके लिए क्या सही है और क्या गलत है, बेशक वो अपने वोट देते समय किसी जाति, धर्म, या नाम पर वोट करते हों, लेकिन उन्हें पता तो होता है की वो जो कर ,रहे हैं वो कहीं न कहीं गलत या सही है।
समय है अपनी भागीदारी को और सुढृढ़ करने का, समय है अपने चुनाव को और सशक्त करने का, समय है ये बताने का की अगर आप नेता, अभिनेता, खिलाडी, मदारी जो भी हों अगर आप को वोट चाहिए तो चुनाव के बाद भी ५ साल आपको मतदाता के साथ ही खड़ा रहना पड़ेगा, चुनाव के बाद भी आपको छेत्र का विकास करना पड़ेगा, चुनाव के बाद भी आपको हाँथ जोड़ कर खड़े रहना पड़ेगा, तब ही आज का जागरूक मतदाता आपको वोट देगा
चुनाव है, घर से निकले और अपने मत का प्रयोग करे, मतदान न करे, क्योंकि दान में बाद उस चीज पर आपका अधिकार नहीं रहता है, मत आपका अधिकार है न की कोई वास्तु जो दान कर दी जाये।
चुनाव करे, सही चुने और देश को सशक्त बनाये
Friday, May 3, 2019
वोट कटुवा राजनीति - गठबंधन का फरेब जनता के साथ ?
लोकसभा चुनाव चल रहे हैं, और हर राजनितिक पार्टी चाहती है की वो लोकसभा चुनाव जीते, चाहे वो १ सीट पर चुनाव लड़ रहे हों, या पूरे के पोरे ५४२ सीटों पर। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी पार्टियां लोकसभा में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती हैं, येन-केन-प्रकारेण मतलब किसी भी तरह से अपनी उपस्तिथि दर्ज करनी है।
छोटी-छोटी पार्टियां या निर्दलीय उम्मीदवार तो चुनाव में उतरते ही सिर्फ इस लिए हैं की या तो उन्हें बेवजह की प्रसिद्धि मिल जाये या तो वो किसी ऐसे उम्मीदवार का वोट काट सके और उनका मन-चाहा उम्मीदवार जीत सके, ये सब चुनाव में बहुत आम बात है, या यूँ कह ले की ये आम चुनाव की आम बात है, नहीं बनारस जैसे लोकसभा सीट पर जहाँ विपक्ष का कोई उम्मीदवार हार के डर से नहीं लड़ रहा हो उसी सीट पर करीब करीब १०० से अधिक लोगों ने अपना नामांकन भरा था जिन्हे शायद उनके खुद के मोहल्ले वाले भी नहीं जानते होंगे।
खैर इसमें कोई नया नहीं है, हैरानी तो होती है जब करीब १०० साल से भी पुराणी पार्टी चुनाव में उम्मीदवार सिर्फ वोट काटने के लिए उतरती है ? मतलब राजनीति में राजनितिक पार्टी अब अपने प्रतिद्वंद्वी से सीधे सीधे नहीं लड़ पा रहे हैं तो अब लड़ने की नयी तरकीब निकली है, एक ऐसा गठबंधन किया जाये जो जनता के सामने गठबंधन न लगे, मतलब जनता के सामने तो ये पार्टियां एक दुसरे को गलियां देंगी, और न जाने क्या क्या कहेंगी, लेकिन चुनाव के बाद नतीजा जो भी आये ये सारी पार्टी एक हो जाएगी और गठबंधन का नाम दे देगी।
पूरे चुनाव में विपक्ष इस तरह से कमजोर होकर चुनाव लड़ेगा इसकी अपेक्षा नहीं थी। आलम ये है की विपक्ष इतनी में भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है की एक साथ खड़ा होकर लड़ सके। पता नहीं विपक्ष आम जनता को इतना मूर्ख समझने की मूर्खता कैसे कर सकता है?
जनता को सजग रहने की जरुरत है की वोट किसे कर रहे हैं
वोट करे, और एक सशक्त सरकार चुने
Monday, April 29, 2019
श्रीलंका पर आतंकी हमला क्या भारतियों के लिए चेतावनी ??
विगत २३ अप्रैल को श्रीलंका में एक आतंकी हमला हुआ, जिसमे हज़ारों लोग हताहत हुए और करीब ३२५ लोगों को अपने जान से हाँथ धोना पड़ा, इतना ही नहीं इस भयावह घटना में सिर्फ श्रीलंका ही नहीं अपितु अन्य राष्ट्रों के भी नागरिकों को भी अपने जान से हाँथ धोना पड़ा, जिसमे भारत, पाकिस्तान, अमेरिका, व अन्य राष्ट्र के नागरिक शामिल थे, ऐसा कहा जाता है की इस हमले के पीछे ही कट्टरपंथी सोच वाले आतंकी संघटन का हाँथ था। दशकों से श्रीलंका ने इस तरह की किसी घटना का सामना नहीं किया था, तो आखिर वजह क्या थी ? इतनी बड़ी घटना आखिर घटी कैसे ? कौन है इसके लिए दोषी ?
आतंकी घटना के घाट जाने के बाद अमूमन जैसे की होता आया है राष्ट्र की सुरक्षा एजेंसी ने तहकीकात करनी शरू की तो पता चला की इस घटना की जानकारी तो पहले से ही राष्ट्र के राष्ट्रपति को इस होने वाले आतंकी हमले की जानकारी तो भारत की ओर से दे दी गयी थी ? और इस बाबत श्रीलंका के प्रधानमंत्री को कोई सूचना नहीं दी गयी ? अचंभित कर देने वाली घटना, ये तो उस आतंकी घटना से भी जयादा भयावह थी, जहाँ पर उन्हें होने वाली घटना के बारे में सूचना थी लेकिन उन्होंने कोई ठोस कदम नहीं उठाया ? आखिर क्या वजह थी इसके पीछे ?? प्रश्न बहुत हैं जवाब चाहिए ?
अब बारी आती है इस दुर्घटना की जड़ में जाने की, आपको विदित हो की श्रीलंका में कुछ महीने पहले राजनितिक उथल-पुथल हुई थी, इस राजनितिक उथल-पुथल की वजह से श्रीलंका में गठबंधन की सरकार बनानी पड़ी, नतीजा ये की दो राजनितिक दलों में सत्ता की चाहत में सरकार तो बना ली लेकिन आपसी सहयोग न कर सके जिसके चलते श्रीलंका के लोगों को इतनी बड़ी छति उठानी पड़ी
प्रश्न ये है की आखिर इस राजनितिक उथल-पुथल की आखिर वजह क्या थी ? वजह थे श्रीलंका के अपने लोग, वहां के निवासी, हाँ ये १०० फीसदी सच है। अब आपको ये लग रहा होगा की इसमें बेचारी जनता की गलती? अब सरकारें अपना काम न करे तो जनता क्या कर सकती है ? जनता तो आखिर बेचारी ही होती है। लेकिन गलती है तो सिर्फ जनता की है क्योंकि जब आम चुनाव आये तो उन्होंने एक सशक्त सरकार चुन कर नहीं भेजी जिसका खामियाज़ा आज उसे भुगतना पड़ रहा है।
आज भी समय है हम भारतीयों को श्रीलंका में हुई घटना से सीखना चाइये, हमें इस आम चुनाव में एक ऐसे ससक्त सरकार चुननी है जो की ना सिर्फ देश की तरक्की में अपने आप को पूरी तरह झोंक दे अपितु बाहरी ताकतों से भी देश की सुरक्षा कर सके।
आगे आइये और एक सशक्त सरकार बनाने में अपना सहयोग करे, वोट करे, सही चुने ताकि आपको अपने चुनाव पर गर्व हो सके।
Tuesday, April 23, 2019
दो सीट पर चुनाव लड़ना क्या पैसे की बर्बादी ? जिम्मेदार कौन ?
दो सीट पर चुनाव लड़ना क्या पैसे की बर्बादी ? जिम्मेदार कौन ?
अक्सर लोकसभा हो या विधानसभा की चुनाव होता है तो ये देखा जाता है की कुछ राजनेता एक साथ दो अलग अलग छेत्रों से चुनाव लड़ते हैं, और ऐसा सन्देश देने की कोशिश करते हैं, की वो एक दो छेत्रों का प्रतिनिधित्व करके उस छेत्र की जनता को धन्य कर रहे हैं, या कोई अहसान कर रहे हैं ? एक साथ दो जगह चुनाव लड़ने का क्या औचित्य है? क्या ऐसा करने से वो जनप्रतिनिधि दो छेत्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है अगर वो चुनाव जीत जायेगा ? ऐसे नहीं है जैसे ही कोई नेता एक साथ दो छेत्र से चुनाव जीतता है उसे तुरंत दो में से किसी एक छेत्र का चुनाव करना होता है फिर एक चुनाव छेत्र को छोड़ना पड़ता है, मतलब चुनाव आयोग को चुनाव के तुरंत बाद फिर से उपचुनाव करवाना अनिवार्य है।
यहाँ दो प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, पहला ये की ये जानते हुए की एक उम्मीदवार जो की दो-दो चुनाव छेत्र से चुनाव लड़ रहा है उसे आम जनता मूर्खों की तरह ये जानते हुए भी की चुनाव जीतते ही छोड़ कर चला जायेगा चुनाव की जीत क्यों दिलवा देती है ? क्या आम जनता इतनी मूर्ख है या उसे मूर्ख बनाना इतना आसान है की जो प्रतिनिधि उस छेत्र की जवाबदारी पहले से ही नहीं लेना चाहता है उसे आखिर क्यों अपना वोट देकर जिताया जाये ? आखिर उससे उस छेत्र की जनता को क्या हांसिल होगा ? क्या जनता को इस बात का एहसास है की एक चुनाव के बाद उसे फिर दूसरे उपचुनाव में झोंक दिया जायेगा ? क्या जनता के पास अपने कोई खुद के मुद्दे नहीं होते जिसके आधार पर वो निर्णय करे की उसे किस उम्मीदवार को वोट देना है ? या सिर्फ बहुचर्चित चेहरे के आगे जनता अपने सारे मुद्दे भूल कर गाय-बकरियों की तरह बूथ पर जाकर वोट डाल कर चली आती है ? सोचिये ?
दूसरा सबसे अहम् मुद्दा ये है की क्या उपचुनाव करवाने में देश के पैसों की बर्बादी नहीं होती ? जैसी की जानकारी है की चुनाव आयोग एक बूथ पर लगभग १० लाख रूपये खर्च करती है, और एक बूथ पर १४०० से ज्यादा वोटर्स नहीं हो सकते मतलब एक सीट पर करीब करीब २५० से ज्यादा बूथ २.५ से ३ करोड़ रूपए बर्बाद कर दिए जाते हैं, जैसे ही एक उमीदवार दो सीट से अपनी दावेदारी ठोकता है। क्या चुनाव आयोग ने कभी एक बाबत संज्ञान लिया ?
आवशयकता है चुनाव आयोग को कोई ऐसा नियम बनाये की यदि कोई उम्मीदवार दो सीटों से चुनाव जीतता है और एक सीट छोड़ता है उस उम्मीदवार कोई चुनाव पर हुए खर्च चुनाव आयोग को वापस करने होंगे, साथ ही साथ छेत्र की जनता को भी सजग होना होगा की किसी ऐसे उम्मीदवार को वोट ही क्यों देना जो चुनाव से पहले ही उसका नहीं है।
सही चुने जरूर चुने, चुने जरूर
अक्सर लोकसभा हो या विधानसभा की चुनाव होता है तो ये देखा जाता है की कुछ राजनेता एक साथ दो अलग अलग छेत्रों से चुनाव लड़ते हैं, और ऐसा सन्देश देने की कोशिश करते हैं, की वो एक दो छेत्रों का प्रतिनिधित्व करके उस छेत्र की जनता को धन्य कर रहे हैं, या कोई अहसान कर रहे हैं ? एक साथ दो जगह चुनाव लड़ने का क्या औचित्य है? क्या ऐसा करने से वो जनप्रतिनिधि दो छेत्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है अगर वो चुनाव जीत जायेगा ? ऐसे नहीं है जैसे ही कोई नेता एक साथ दो छेत्र से चुनाव जीतता है उसे तुरंत दो में से किसी एक छेत्र का चुनाव करना होता है फिर एक चुनाव छेत्र को छोड़ना पड़ता है, मतलब चुनाव आयोग को चुनाव के तुरंत बाद फिर से उपचुनाव करवाना अनिवार्य है।
यहाँ दो प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, पहला ये की ये जानते हुए की एक उम्मीदवार जो की दो-दो चुनाव छेत्र से चुनाव लड़ रहा है उसे आम जनता मूर्खों की तरह ये जानते हुए भी की चुनाव जीतते ही छोड़ कर चला जायेगा चुनाव की जीत क्यों दिलवा देती है ? क्या आम जनता इतनी मूर्ख है या उसे मूर्ख बनाना इतना आसान है की जो प्रतिनिधि उस छेत्र की जवाबदारी पहले से ही नहीं लेना चाहता है उसे आखिर क्यों अपना वोट देकर जिताया जाये ? आखिर उससे उस छेत्र की जनता को क्या हांसिल होगा ? क्या जनता को इस बात का एहसास है की एक चुनाव के बाद उसे फिर दूसरे उपचुनाव में झोंक दिया जायेगा ? क्या जनता के पास अपने कोई खुद के मुद्दे नहीं होते जिसके आधार पर वो निर्णय करे की उसे किस उम्मीदवार को वोट देना है ? या सिर्फ बहुचर्चित चेहरे के आगे जनता अपने सारे मुद्दे भूल कर गाय-बकरियों की तरह बूथ पर जाकर वोट डाल कर चली आती है ? सोचिये ?
दूसरा सबसे अहम् मुद्दा ये है की क्या उपचुनाव करवाने में देश के पैसों की बर्बादी नहीं होती ? जैसी की जानकारी है की चुनाव आयोग एक बूथ पर लगभग १० लाख रूपये खर्च करती है, और एक बूथ पर १४०० से ज्यादा वोटर्स नहीं हो सकते मतलब एक सीट पर करीब करीब २५० से ज्यादा बूथ २.५ से ३ करोड़ रूपए बर्बाद कर दिए जाते हैं, जैसे ही एक उमीदवार दो सीट से अपनी दावेदारी ठोकता है। क्या चुनाव आयोग ने कभी एक बाबत संज्ञान लिया ?
आवशयकता है चुनाव आयोग को कोई ऐसा नियम बनाये की यदि कोई उम्मीदवार दो सीटों से चुनाव जीतता है और एक सीट छोड़ता है उस उम्मीदवार कोई चुनाव पर हुए खर्च चुनाव आयोग को वापस करने होंगे, साथ ही साथ छेत्र की जनता को भी सजग होना होगा की किसी ऐसे उम्मीदवार को वोट ही क्यों देना जो चुनाव से पहले ही उसका नहीं है।
सही चुने जरूर चुने, चुने जरूर
Monday, April 22, 2019
भक्त बनाम चमचा
भक्त बनाम चमचा
यह विषय बहुत ही रोचक है आज के परिवेश में, जब की राष्ट्र में चुनावी बिसात बिझ चुकी है, हर राजनितिक दाल अपनी अपनी चाल चल रहे हैं, कभी शय तो कभी मात का खेल चाल रहा है, इस बीच में प्यादे बने हैं, सभी दलों के समर्थक, या यूँ कह लो की भक्त और चमचे। अब तक आपको तो मेरी बात समझ में आ ही गयी होगी, भक्त बोले तो बी जे पी का समर्थक और चमचा बोले तो कांग्रेस और सहयोगी दलों का समर्थक।
अब जब सोशल मिडिया का जमाना है तो भक्त और चमचों की भिड़ंत भी बहुत रोचक होती है, भक्त जहाँ मोदी को वापस सत्ता दिलाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं तो वही चमचे भी किसी से कम नहीं हैं, राहुल गाँधी के समर्थन में कुछ कर जाने को तत्पर हैं, हाँ बेशक इसमें कुछ लोग पार्टी की ओर से संचालित होते हैं लेकिन बहुतायत तो सिर्फ जंग में भिड़े हुए हैं।
अरे अब आप को लग रहा होगा की जंग कैसी ? अरे भाई साहब ये जंग ही तो है, कहते हैं न की प्यार और जंग में सब कुछ जायज है, तो इसी लिए ये भक्त और चमचे इस जंग में किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं, इसकी माँ, उसकी बहन ये सब तो बहुत ही सामान्य सी बात है, न ही शब्दों की मर्यादा है, और न ही वैचारिक शुद्धता , एक तरह का मानसिक दिवालियापन सा है, होड़ लगी है तो सिर्फ अपने आप को एक समूह को सही ठहराने की, अगर वो गलत हो तो भी जंग तो जीतने ही है, भले ही उस विषय की समझ न हो, लेकिन विषय पर अपनी मूर्खता के झंडे तो गाड़ने ही हैं।
चुनाव है कोई न कोई पार्टी जीत भी जाएगी, लेकिन देखिये इस चक्कर में आप कहीं इंसान से, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, दलित, सवर्ण, यादव इत्यादि तो नहीं बनते जा रहे हैं? कहीं आप की अपनी वैचारिक स्वछन्दता किसी की गुलाम तो नहीं बन जा रही है? कहीं आप की सोंच को कुंठित तो नहीं कर दी जा रही है ? मेरा मानना है की हम सभी लोगों की अपनी अपनी आई क्यू लेवल अच्छी होती है, और जब में भेद चाल में चलते हैं, तो हमारी सोचने की शक्ति कुंद हो जाती यही, तो अपनी सोच को जिन्दा रखे
चुने वही जो सही हो, चुनाव है तो चुने जरूर।
DATAHE KI KALAM SE
यह विषय बहुत ही रोचक है आज के परिवेश में, जब की राष्ट्र में चुनावी बिसात बिझ चुकी है, हर राजनितिक दाल अपनी अपनी चाल चल रहे हैं, कभी शय तो कभी मात का खेल चाल रहा है, इस बीच में प्यादे बने हैं, सभी दलों के समर्थक, या यूँ कह लो की भक्त और चमचे। अब तक आपको तो मेरी बात समझ में आ ही गयी होगी, भक्त बोले तो बी जे पी का समर्थक और चमचा बोले तो कांग्रेस और सहयोगी दलों का समर्थक।
अब जब सोशल मिडिया का जमाना है तो भक्त और चमचों की भिड़ंत भी बहुत रोचक होती है, भक्त जहाँ मोदी को वापस सत्ता दिलाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं तो वही चमचे भी किसी से कम नहीं हैं, राहुल गाँधी के समर्थन में कुछ कर जाने को तत्पर हैं, हाँ बेशक इसमें कुछ लोग पार्टी की ओर से संचालित होते हैं लेकिन बहुतायत तो सिर्फ जंग में भिड़े हुए हैं।
अरे अब आप को लग रहा होगा की जंग कैसी ? अरे भाई साहब ये जंग ही तो है, कहते हैं न की प्यार और जंग में सब कुछ जायज है, तो इसी लिए ये भक्त और चमचे इस जंग में किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं, इसकी माँ, उसकी बहन ये सब तो बहुत ही सामान्य सी बात है, न ही शब्दों की मर्यादा है, और न ही वैचारिक शुद्धता , एक तरह का मानसिक दिवालियापन सा है, होड़ लगी है तो सिर्फ अपने आप को एक समूह को सही ठहराने की, अगर वो गलत हो तो भी जंग तो जीतने ही है, भले ही उस विषय की समझ न हो, लेकिन विषय पर अपनी मूर्खता के झंडे तो गाड़ने ही हैं।
चुनाव है कोई न कोई पार्टी जीत भी जाएगी, लेकिन देखिये इस चक्कर में आप कहीं इंसान से, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, दलित, सवर्ण, यादव इत्यादि तो नहीं बनते जा रहे हैं? कहीं आप की अपनी वैचारिक स्वछन्दता किसी की गुलाम तो नहीं बन जा रही है? कहीं आप की सोंच को कुंठित तो नहीं कर दी जा रही है ? मेरा मानना है की हम सभी लोगों की अपनी अपनी आई क्यू लेवल अच्छी होती है, और जब में भेद चाल में चलते हैं, तो हमारी सोचने की शक्ति कुंद हो जाती यही, तो अपनी सोच को जिन्दा रखे
चुने वही जो सही हो, चुनाव है तो चुने जरूर।
DATAHE KI KALAM SE
Saturday, April 13, 2019
चुनाव आयोग और इ व् म पर प्रश्नचिन्ह ? एवं आयोग की साख
चुनाव आयोग और इ व् म पर प्रश्नचिन्ह ? एवं आयोग की साख
चुनावी दंगल शुरू हो गया है, पहले चरण की वोटिंग भी हो गयी है, और शुरू हो गया है राजनीतिक दलों का चुनाव आयोग और इ व् म पर प्रश्नचिन्ह लगाने का सिलसिला, विगत कुछ वर्षों में देखा गया है की जो भी राजनितिक दल चुनाव हारते हैं, मुख्यतः कांग्रेस समेत उनके सहयोगी दल, अपनी हाल का ठीकरा चुनाव आयोग पर और इ व् म पर फोड़ देते हैं, और उस बहाने लोकतंत्र का मखोल बनते है, अगर सीधे दौर पर देख जाये जहाँ ये दल इ व् म के बहाने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं जिसके कोई पुख्ता सबूत आज तक नहीं मिले हैं, बार बार चुनाव आयोग द्वारा आमंत्रित करने के बावजूद भी कोई दल इस सम्बन्ध में कोई ठोस तर्क नहीं दे सका है, वही दूसरी ओर ये जानता द्वारा दिए गए फैसले को भी नकारते हैं, जो की लोकतंत्र के अत्यंत ही घातक है।
चुनावी मौसम में, इ व् म की जगह जगह खराबी का आना शायद एक बहुत बड़ा कारण है जिसकी वजह किसी कोई भी इ व् म की विश्वश्नीयता पर प्रश्न उठाने के अवसर प्रदान करता है, और भला करे भी क्यों न प्रश्न ? जब भारत का संविधान चुनाव आयोग को निष्पक्ष चुनाव करने का इतना बड़ा दायित्व देता है तो चुनाव आयोग का ये दायित्व है की वो किसी भी हालत में इतनी बड़ी संख्या में इ व् म की खराबी की समस्या को रोके, आखिर क्या वजह है की चुनाव आयोग इस समस्या से निपट नहीं पा रहा है ? ये तो कतई नहीं समझा जा सकता की चुनाव आयोग के पास संसाधनों की कोई कमी है ? और अगर है तो ये एक चिंतनीय विषय है जिस पर देश की सरकार, उच्चतम न्यायलय, तथा सम्बंधित विभागों की तत्काल संज्ञान लेना चाहिए।
चुनाव आयोग जिस दिन इन छुटपुट समस्यांओ से पार पा लेगा और इ व् म में खराबी की खबर आनी बंद हो जाएगी, उस दिन संभव है की राजनितिक दलों को इ व् म पर प्रश्न उठाने में थोड़ी मशक्त करनी पड़ेगी, क्योंकि आज तो ये बहुत ही सहज है की जब इतनी बड़ी मात्रा में इ व् म में खराबी पायी जा रही है तो ये भी मुमकिन है की इ व् म में गड़बड़ी भी की गयी हो ? और वैसे भी आज के परिप्रेच्छ में किसी के भी ऊपर कोई भी आधारहिन् लांछन लगा देना काफी सहज है, क्योंकि अभी तक हमारी न्याय प्रणाली इतनी भी सक्छम नहीं हुई है की तत्काल किसी भी विषय का संज्ञान लेकर कार्यवाही की जा सके।
जहाँ जरुरत है की चुनाव आयोग ये सुनिचित करे की किसी भी बूथ पर किसी भी प्रकार से इ व् म में कोई खराबी न आने पाए, तथा साथ ही साथ ये आवश्यकता है की चुनाव आयोग को ये अधिकार दिए जाएँ की अगर कोई राजनितिक दल आधारहीन तथ्यों पर आयोग पर कोई लांछन लगता है तो, आयोग उसका संज्ञान उस दल पर आवश्यक कारवाही कर सके तभी जा कर चुनाव आयोग की साख मजबूत होगी,
लोकतंत्र का महापर्व है, इसमें सम्मिलित होकर अपने बहुमूल्य मतों का प्रयोग करे और एक सार्थक सरकार बनाने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे.
चुनावी दंगल शुरू हो गया है, पहले चरण की वोटिंग भी हो गयी है, और शुरू हो गया है राजनीतिक दलों का चुनाव आयोग और इ व् म पर प्रश्नचिन्ह लगाने का सिलसिला, विगत कुछ वर्षों में देखा गया है की जो भी राजनितिक दल चुनाव हारते हैं, मुख्यतः कांग्रेस समेत उनके सहयोगी दल, अपनी हाल का ठीकरा चुनाव आयोग पर और इ व् म पर फोड़ देते हैं, और उस बहाने लोकतंत्र का मखोल बनते है, अगर सीधे दौर पर देख जाये जहाँ ये दल इ व् म के बहाने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं जिसके कोई पुख्ता सबूत आज तक नहीं मिले हैं, बार बार चुनाव आयोग द्वारा आमंत्रित करने के बावजूद भी कोई दल इस सम्बन्ध में कोई ठोस तर्क नहीं दे सका है, वही दूसरी ओर ये जानता द्वारा दिए गए फैसले को भी नकारते हैं, जो की लोकतंत्र के अत्यंत ही घातक है।
चुनावी मौसम में, इ व् म की जगह जगह खराबी का आना शायद एक बहुत बड़ा कारण है जिसकी वजह किसी कोई भी इ व् म की विश्वश्नीयता पर प्रश्न उठाने के अवसर प्रदान करता है, और भला करे भी क्यों न प्रश्न ? जब भारत का संविधान चुनाव आयोग को निष्पक्ष चुनाव करने का इतना बड़ा दायित्व देता है तो चुनाव आयोग का ये दायित्व है की वो किसी भी हालत में इतनी बड़ी संख्या में इ व् म की खराबी की समस्या को रोके, आखिर क्या वजह है की चुनाव आयोग इस समस्या से निपट नहीं पा रहा है ? ये तो कतई नहीं समझा जा सकता की चुनाव आयोग के पास संसाधनों की कोई कमी है ? और अगर है तो ये एक चिंतनीय विषय है जिस पर देश की सरकार, उच्चतम न्यायलय, तथा सम्बंधित विभागों की तत्काल संज्ञान लेना चाहिए।
चुनाव आयोग जिस दिन इन छुटपुट समस्यांओ से पार पा लेगा और इ व् म में खराबी की खबर आनी बंद हो जाएगी, उस दिन संभव है की राजनितिक दलों को इ व् म पर प्रश्न उठाने में थोड़ी मशक्त करनी पड़ेगी, क्योंकि आज तो ये बहुत ही सहज है की जब इतनी बड़ी मात्रा में इ व् म में खराबी पायी जा रही है तो ये भी मुमकिन है की इ व् म में गड़बड़ी भी की गयी हो ? और वैसे भी आज के परिप्रेच्छ में किसी के भी ऊपर कोई भी आधारहिन् लांछन लगा देना काफी सहज है, क्योंकि अभी तक हमारी न्याय प्रणाली इतनी भी सक्छम नहीं हुई है की तत्काल किसी भी विषय का संज्ञान लेकर कार्यवाही की जा सके।
जहाँ जरुरत है की चुनाव आयोग ये सुनिचित करे की किसी भी बूथ पर किसी भी प्रकार से इ व् म में कोई खराबी न आने पाए, तथा साथ ही साथ ये आवश्यकता है की चुनाव आयोग को ये अधिकार दिए जाएँ की अगर कोई राजनितिक दल आधारहीन तथ्यों पर आयोग पर कोई लांछन लगता है तो, आयोग उसका संज्ञान उस दल पर आवश्यक कारवाही कर सके तभी जा कर चुनाव आयोग की साख मजबूत होगी,
लोकतंत्र का महापर्व है, इसमें सम्मिलित होकर अपने बहुमूल्य मतों का प्रयोग करे और एक सार्थक सरकार बनाने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे.
Friday, April 12, 2019
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी घोषणापत्रलोकसभा चुनाव हैं तो चुनावी घोषणा...
DATAHE KI KALAM SE : चुनावी घोषणापत्र
लोकसभा चुनाव हैं तो चुनावी घोषणा...: चुनावी घोषणापत्र लोकसभा चुनाव हैं तो चुनावी घोषणा पत्र तो बनगे ही, कुछ दिनों पहले ही कांग्रेस पार्टी ने अपना घोषणा पत्र जारी किया, जिसे ब...
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DATAHE KI KALAM SE : अब की बार ७२००० - गरीबी हटाओ भिखारी बनाओ
इस बार चु...: अब की बार ७२००० - गरीबी हटाओ भिखारी बनाओ इस बार चुनाव में भारत का मुख्य विपछि दाल हालाँकि ये तमगा भी उनके पास अब नहीं है कांग्रेस ने चुनाव...
इस बार चु...: अब की बार ७२००० - गरीबी हटाओ भिखारी बनाओ इस बार चुनाव में भारत का मुख्य विपछि दाल हालाँकि ये तमगा भी उनके पास अब नहीं है कांग्रेस ने चुनाव...
Thursday, April 11, 2019
परंपरागत सीट वर्सेज मतदाताओं की बुद्धिमत्ता - किसी भी सरकार की जवाबदेही से पहले हमें अपनी जवाबदेही खुद तय करनी पड़ेगी
जब भी चुनाव आते हैं तो एक बात हमेशा सुनने में आती है की, फैलाने की ये परंपरागत सीट है, यहाँ से कोई जीत ही नहीं सकता, उधाहरण के लिए ले लीजिये अमेठी जिस सालों से गाँधी परिवार का वर्चस्व है, रायबरेली वहां पर भी गाँधी परिवार सालों से जीतता आ रहा है, ये लिस्ट बहुत ही लम्बी है, और मुछे इस पचड़े में पड़ना भी नहीं है, क्योंकि मेरा मुद्दा ये नहीं है की किस पार्टी की कौन सी परंपरागत सीट है, मुद्दा यहाँ पर ये की जिस सीट पर वर्षो से एक ही पार्टी का राज रहा हो, वहां विकास की गति धीमी कैसे पड़ जाती है, आखिर वहां का मतदाता कैसे ही एक उसी पार्टी को या उम्मीदवार को वोट करता चला आता है जो की एक बार जीतने के बाद आगे के ५ साल छेत्र में आता तक नहीं और फिर ५ साल बाद जब चुनाव आता है तो वहां की जनता आखिर उसमे ऐसा क्या देखती है दुबारा चुन कर भेज देती है, यह बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है मतदाताओं की समझ पर ?
आज जब हम इक्कीसवी सदी में जी रहे है, जहाँ पर समाज में पढ़े लिखे लोगों की जमात बढ़ती जा रही है, तो क्या आज भी जब हम चुनाव में वोट डालते हैं तो हमारे पास हमारे अपने मुद्दे नहीं होते जिसके बलबूते पर हम ये निश्चित करे की जो भी राजनितिक पार्टी है वो उन मुद्दों को अपने अजेंडे में ले और उस आधार पर मतदाता अपने अधिकार का प्रयोग करके सही उम्मीदवार का चुनाव करे जो सही मायने में उस छेत्र की जनता का प्रतिनिधत्व करे और छेत्र का विकास करे।
क्यों जब चुनाव आता है तो समाज का वो बुद्धिजीवी वर्ग मूर्खों जैसा व्यहार करता है? क्यों जब चुनाव आता है तो वोट डालते समय वो ये तय नहीं कर पता है की जिस उम्मीदवार ने ५ साल तक छेत्र का विकास नहीं किया आगे भी वो सिर्फ भाषणबाजी करके हमें अगले ५ साल के लिए मूर्ख बनाकर चला जायेगा? क्यों जब हम वोट देते हैं तो ये नहीं समझ पाते हैं की कोई वर्ग विशेष ये समुदाय विशेष किसी छेत्र अकेले विकास नहीं कर सकता, उसके लिए सभी वर्गों का सहयोग आवश्यक है? क्यों कुछ तात्कालिक लाभ के लिए देश के भविष्य या छेत्र के भविष्य के खिलवाड़ कर देते हैं? प्रश्न ऐसे हैं जिनका जवाब हमें खुद ही देना होगा और किसी भी सरकार की जवाबदेही से पहले हमें अपनी जवाबदेही खुद तय करनी पड़ेगी, हम कैसे किसी से सवाल कर सकते हैं, जब हमारा चुनाव ही निष्पक्ष न हो ?
आवश्यकता है अब हमें जागरूक होने की, किसी भी चुनाव से पहले ये तय करने की क्या हमारा चुनाव सही है? क्या हम जिसे चुनने जा रहे हैं जो हमारी जरूरतों कोई पूरी करने की कोशिश भी करेगा ? क्या वो सछम है ? क्या वो सिर्फ किसी परिवार में जन्मा है तो वो ही सही उम्मीदवार है ?
अब हमें जरुरत है अपने अजेंडे सेट करने की, अब मतदाता अपना भविष्य खुद तय करे, तय करे की जो चुन कर आएगा किस तरह से और कैसे छेत्र का विकास करेगा, खुद तय करे की जो उम्मीदवार चुन कर आएगा वो कितना जवाबदेह होगा और साथ ही साथ जनता अपनी जवाबदेही खुद तय करे।
लोकतंत्र का महापर्व है, वोट करके इस पर्व को मनाये और अपने तथा अपने देश के भविस्य को सही हाथों में सौपे, मूर्ख न बने।
जब भी चुनाव आते हैं तो एक बात हमेशा सुनने में आती है की, फैलाने की ये परंपरागत सीट है, यहाँ से कोई जीत ही नहीं सकता, उधाहरण के लिए ले लीजिये अमेठी जिस सालों से गाँधी परिवार का वर्चस्व है, रायबरेली वहां पर भी गाँधी परिवार सालों से जीतता आ रहा है, ये लिस्ट बहुत ही लम्बी है, और मुछे इस पचड़े में पड़ना भी नहीं है, क्योंकि मेरा मुद्दा ये नहीं है की किस पार्टी की कौन सी परंपरागत सीट है, मुद्दा यहाँ पर ये की जिस सीट पर वर्षो से एक ही पार्टी का राज रहा हो, वहां विकास की गति धीमी कैसे पड़ जाती है, आखिर वहां का मतदाता कैसे ही एक उसी पार्टी को या उम्मीदवार को वोट करता चला आता है जो की एक बार जीतने के बाद आगे के ५ साल छेत्र में आता तक नहीं और फिर ५ साल बाद जब चुनाव आता है तो वहां की जनता आखिर उसमे ऐसा क्या देखती है दुबारा चुन कर भेज देती है, यह बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है मतदाताओं की समझ पर ?
आज जब हम इक्कीसवी सदी में जी रहे है, जहाँ पर समाज में पढ़े लिखे लोगों की जमात बढ़ती जा रही है, तो क्या आज भी जब हम चुनाव में वोट डालते हैं तो हमारे पास हमारे अपने मुद्दे नहीं होते जिसके बलबूते पर हम ये निश्चित करे की जो भी राजनितिक पार्टी है वो उन मुद्दों को अपने अजेंडे में ले और उस आधार पर मतदाता अपने अधिकार का प्रयोग करके सही उम्मीदवार का चुनाव करे जो सही मायने में उस छेत्र की जनता का प्रतिनिधत्व करे और छेत्र का विकास करे।
क्यों जब चुनाव आता है तो समाज का वो बुद्धिजीवी वर्ग मूर्खों जैसा व्यहार करता है? क्यों जब चुनाव आता है तो वोट डालते समय वो ये तय नहीं कर पता है की जिस उम्मीदवार ने ५ साल तक छेत्र का विकास नहीं किया आगे भी वो सिर्फ भाषणबाजी करके हमें अगले ५ साल के लिए मूर्ख बनाकर चला जायेगा? क्यों जब हम वोट देते हैं तो ये नहीं समझ पाते हैं की कोई वर्ग विशेष ये समुदाय विशेष किसी छेत्र अकेले विकास नहीं कर सकता, उसके लिए सभी वर्गों का सहयोग आवश्यक है? क्यों कुछ तात्कालिक लाभ के लिए देश के भविष्य या छेत्र के भविष्य के खिलवाड़ कर देते हैं? प्रश्न ऐसे हैं जिनका जवाब हमें खुद ही देना होगा और किसी भी सरकार की जवाबदेही से पहले हमें अपनी जवाबदेही खुद तय करनी पड़ेगी, हम कैसे किसी से सवाल कर सकते हैं, जब हमारा चुनाव ही निष्पक्ष न हो ?
आवश्यकता है अब हमें जागरूक होने की, किसी भी चुनाव से पहले ये तय करने की क्या हमारा चुनाव सही है? क्या हम जिसे चुनने जा रहे हैं जो हमारी जरूरतों कोई पूरी करने की कोशिश भी करेगा ? क्या वो सछम है ? क्या वो सिर्फ किसी परिवार में जन्मा है तो वो ही सही उम्मीदवार है ?
अब हमें जरुरत है अपने अजेंडे सेट करने की, अब मतदाता अपना भविष्य खुद तय करे, तय करे की जो चुन कर आएगा किस तरह से और कैसे छेत्र का विकास करेगा, खुद तय करे की जो उम्मीदवार चुन कर आएगा वो कितना जवाबदेह होगा और साथ ही साथ जनता अपनी जवाबदेही खुद तय करे।
लोकतंत्र का महापर्व है, वोट करके इस पर्व को मनाये और अपने तथा अपने देश के भविस्य को सही हाथों में सौपे, मूर्ख न बने।
Tuesday, April 9, 2019
अब की बार ७२००० - गरीबी हटाओ भिखारी बनाओ
इस बार चुनाव में भारत का मुख्य विपछि दाल हालाँकि ये तमगा भी उनके पास अब नहीं है कांग्रेस ने चुनावी मौसम में एक ऐसा सगूफा छोड़ा है की अगर वो इस बार चुनाव जीत कर आते हैं तो वो जनसँख्या की २० प्रतिशत को ७२००० पार्टी वर्ष दिया जायेगा। अभी हम इस पचड़े में नहीं पड़ते हैं की ये पैसे आएंगे कहाँ से, पहले ये समझने की कोशिश करते हैं की किस प्रकार कांग्रेस इस दावे के साथ कांग्रेस ने कैसे देश के नौजवानों को निठला बनाने के एक्शन प्लान पर काम करना सुरु किया है।
अगर सीधी भाषा में समझा जाये की किसी भी आदमी की मुख्य जरुरत क्या तो वो है रोजी-रोटी-मकान, अब सरकारे पहले से मुफ़्त का खाना मुहैया करवा रही हैं और जो थोड़ी बहुत जरुरत है उसे महीने के ६००० घर बैठे मिल जाये तो फिर क्या बात है, फिर किसे काम करने की जरुरत है, भला किसे हराम का खाना और आराम की नींद नहीं भाती। इक ही झटके में जितने बेरोजगार थे वो भिखारी बन गए, अरे मतलब स्टैण्डर्ड वाले भिखारी जिन्हे रोड पर खड़े होकर दे अल्लाह के नाम तुझको दाता रखे भी नहीं गाना पड़ेगा, उल्टा मोबाइल में फ्री का गाना भी सुन सकते हैं और जो भिखारी है वो भिखारी रहेंगे ही।
भयावह स्थिति तो अब बनेगी जब घर बैठा खली दिमाग का hitech भिखारी जिसके पास न ही खाने की समस्या है न ही सोने की तो वो फिर अपनी किसी दूसरी आकांछाओं को भी फ्री में पूरा करने की कोशिश करेगा, अपराध को बढ़ावा, बलात्कार को बढ़ावा, और जाने कैसी कैसी विसंगतियां समाज में पैदा होंगी जिनका अंदाज़ा लगा पाना भी मुछे असंभव सा प्रतीत हो रहा हो।
अब प्रश्न ये उठता है की ये ७२००० आएंगे कहाँ से, मतलब २० % भिखारियों की जेब कौन भरेगा ? कांग्रेस पार्टी के पास इतना काला धन नहीं की वो सारे पैसे देश के गरीबों में बाँट दे, तो मतलब ये है की २० % भिखारियों की जेब ८० % मेहनत करने वालों की जेब से भरा जायेगा। ये जो ८० % लोग हैं इनमे से अगर १० % लोगों को निकल दिया जाये तो बाकी के बचे ७० % लोग बेचारे अपनी दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में दिन भर कड़ी मेहनत करते हैं फिर कहीं जाकर अपने और अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं, अब इनके और हमरे कंधो पर इन २० % भिखारियों की भी जिम्मेदारी का बोझ आ जायेगा ? भला क्यों भाई ?
अगर बात सिर्फ और सिर्फ किसानो तक सीमित रहती तो समझ में आता है क्योंकि किसान ही इक ऐसी जमात है जब वो मेहनत करती है तो, भले किसान का घर न चले लेकिन पूरे देश का पेट भरता है, सरकार अगर किसानो के हित के लिए कोई भी कदम उठाये वो सराहनीय होगा क्यों वो मेहनत करे हमारा पेट भरते हैं और उन्हें ७२००० देने में किसी भी देश वासी को कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि किसान हैं तो हमें और हमारे बच्चों को दो जून की रोटी नसीब होती है।
चुनाव पर्व सुरु हो गया है, वोट जरूर करे और उसे करे जो आपको सशक्त करे न की भिखारियो की जमात में लाकर खड़ा कर दे, और हाँ हो सकता है की वोट न देकर भी अपने आने वाली पीढ़ी के लिए कब्र खोद रहे हों, इसलिए वोट जरूर करे जो आपको सछम बनाये, आपके साथ खड़ा रहे, समझदार आप हैं इतना मुछे विश्वाश है
दाताहे की कलम से
इस बार चुनाव में भारत का मुख्य विपछि दाल हालाँकि ये तमगा भी उनके पास अब नहीं है कांग्रेस ने चुनावी मौसम में एक ऐसा सगूफा छोड़ा है की अगर वो इस बार चुनाव जीत कर आते हैं तो वो जनसँख्या की २० प्रतिशत को ७२००० पार्टी वर्ष दिया जायेगा। अभी हम इस पचड़े में नहीं पड़ते हैं की ये पैसे आएंगे कहाँ से, पहले ये समझने की कोशिश करते हैं की किस प्रकार कांग्रेस इस दावे के साथ कांग्रेस ने कैसे देश के नौजवानों को निठला बनाने के एक्शन प्लान पर काम करना सुरु किया है।
अगर सीधी भाषा में समझा जाये की किसी भी आदमी की मुख्य जरुरत क्या तो वो है रोजी-रोटी-मकान, अब सरकारे पहले से मुफ़्त का खाना मुहैया करवा रही हैं और जो थोड़ी बहुत जरुरत है उसे महीने के ६००० घर बैठे मिल जाये तो फिर क्या बात है, फिर किसे काम करने की जरुरत है, भला किसे हराम का खाना और आराम की नींद नहीं भाती। इक ही झटके में जितने बेरोजगार थे वो भिखारी बन गए, अरे मतलब स्टैण्डर्ड वाले भिखारी जिन्हे रोड पर खड़े होकर दे अल्लाह के नाम तुझको दाता रखे भी नहीं गाना पड़ेगा, उल्टा मोबाइल में फ्री का गाना भी सुन सकते हैं और जो भिखारी है वो भिखारी रहेंगे ही।
भयावह स्थिति तो अब बनेगी जब घर बैठा खली दिमाग का hitech भिखारी जिसके पास न ही खाने की समस्या है न ही सोने की तो वो फिर अपनी किसी दूसरी आकांछाओं को भी फ्री में पूरा करने की कोशिश करेगा, अपराध को बढ़ावा, बलात्कार को बढ़ावा, और जाने कैसी कैसी विसंगतियां समाज में पैदा होंगी जिनका अंदाज़ा लगा पाना भी मुछे असंभव सा प्रतीत हो रहा हो।
अब प्रश्न ये उठता है की ये ७२००० आएंगे कहाँ से, मतलब २० % भिखारियों की जेब कौन भरेगा ? कांग्रेस पार्टी के पास इतना काला धन नहीं की वो सारे पैसे देश के गरीबों में बाँट दे, तो मतलब ये है की २० % भिखारियों की जेब ८० % मेहनत करने वालों की जेब से भरा जायेगा। ये जो ८० % लोग हैं इनमे से अगर १० % लोगों को निकल दिया जाये तो बाकी के बचे ७० % लोग बेचारे अपनी दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में दिन भर कड़ी मेहनत करते हैं फिर कहीं जाकर अपने और अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं, अब इनके और हमरे कंधो पर इन २० % भिखारियों की भी जिम्मेदारी का बोझ आ जायेगा ? भला क्यों भाई ?
अगर बात सिर्फ और सिर्फ किसानो तक सीमित रहती तो समझ में आता है क्योंकि किसान ही इक ऐसी जमात है जब वो मेहनत करती है तो, भले किसान का घर न चले लेकिन पूरे देश का पेट भरता है, सरकार अगर किसानो के हित के लिए कोई भी कदम उठाये वो सराहनीय होगा क्यों वो मेहनत करे हमारा पेट भरते हैं और उन्हें ७२००० देने में किसी भी देश वासी को कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि किसान हैं तो हमें और हमारे बच्चों को दो जून की रोटी नसीब होती है।
चुनाव पर्व सुरु हो गया है, वोट जरूर करे और उसे करे जो आपको सशक्त करे न की भिखारियो की जमात में लाकर खड़ा कर दे, और हाँ हो सकता है की वोट न देकर भी अपने आने वाली पीढ़ी के लिए कब्र खोद रहे हों, इसलिए वोट जरूर करे जो आपको सछम बनाये, आपके साथ खड़ा रहे, समझदार आप हैं इतना मुछे विश्वाश है
दाताहे की कलम से
Saturday, April 6, 2019
चुनावी घोषणापत्र
लोकसभा चुनाव हैं तो चुनावी घोषणा पत्र तो बनगे ही, कुछ दिनों पहले ही कांग्रेस पार्टी ने अपना घोषणा पत्र जारी किया, जिसे बीजेपी ने हांथो-हाँथ लिया और तो और कांग्रेस पार्टी को देश विरोधी और देश द्रोही तक कर दिया, खैर ये तो होना ही होता है जब भी कोई पार्टी घोषणा पत्र जारी करती है तो विरोधी पार्टी उसका विरोध तो करती ही है नहीं तो चुनाव प्रचार में तड़का कैसे लगेगा। हालाँकि बीजेपी ने अभी तक अपना कोई घोषणा पत्र जारी नहीं किया है।
लेकिन हंसी तब आती है जब की छेत्रिय पार्टियां अपना अपना घोषणा पत्र लेकर आती हैं,जिन्हे ये अच्छे मालूम है की उनके पास उतने नंबर नहीं है जिससे वे उन घोषणा पात्र की किसी भी बात पर अमल नहीं कर सकते जब तक की वो किसी न किसी पार्टी से गठबंधन न का ले, जिसका मतलब ये होता है चुनाव पूर्व ये पार्टियां अपने अपने नंबर के एक गठबंधन करेंगी और सब मिला एक कॉमन मिनिमम प्रोग्रम बनाएंगी जिसका चुनावी घोषणा पत्र से कोई लेना देना नहीं होगा, क्योंकि इन पार्टियों के इतने नंबर तो होंगे नहीं जो की गठबंधन में अपनी सारी बातें मनवा ले।
अब किसी चीज की जरुरत है तो वो है मतदाताओं की जागरूकता की, उन्हें मालूम होना चाइये की जब लोकसभा की चुनाव हो रहा हो तो छेत्रिय पार्टियों का इतना महत्व नहीं रहता और कारण साफ़ है क्योंकि उनके पास संख्या बल नहीं होता, और इस बात चुनाव में तो तस्वीर ही एकदम अलग है, सभी छोटी मोती पार्टियों का एजेंडा सिर्फ और सिर्फ मोदी को हटाना है, उनके पास कोई भी रोड मैप नहीं है जिसे वो ये बता सके वो पहले तो सरकार में आएंगे कैसे, आयंगे तो उनका नेतृत्व कौन करेगा, और अगर नेतृत्व मिल भी गया तो वो मोदी सरकार के विकास के अजेंडे को आगे कैसे बढ़ाएंगे,
अब जनता को आगे आकर राजनितिक पार्टियों से ये सवाल करने होंगे की क्यों नहीं वो सब आगे आकर दूसरा या तीसरे मोर्चे को खड़ा करे और उसके बल पर जनता से वोट डालने की अपील करे, अगर जनता उन्हें पास करके भेजती है तो वो देश कर सरकार चलाएं
जनता को सजग रहना होगा और वोट उसी को डालना होगा जो देश को आगे बढ़ाये, न की परिवार को, न की देश में फिर से दलालों का जाल फैलाये, न की देश की जनता को भिखारी बनाये,
वोट डालिये और देश बचाइए मैंने अपना चुन लिया है आप अपना चुनिए
लोकसभा चुनाव हैं तो चुनावी घोषणा पत्र तो बनगे ही, कुछ दिनों पहले ही कांग्रेस पार्टी ने अपना घोषणा पत्र जारी किया, जिसे बीजेपी ने हांथो-हाँथ लिया और तो और कांग्रेस पार्टी को देश विरोधी और देश द्रोही तक कर दिया, खैर ये तो होना ही होता है जब भी कोई पार्टी घोषणा पत्र जारी करती है तो विरोधी पार्टी उसका विरोध तो करती ही है नहीं तो चुनाव प्रचार में तड़का कैसे लगेगा। हालाँकि बीजेपी ने अभी तक अपना कोई घोषणा पत्र जारी नहीं किया है।
लेकिन हंसी तब आती है जब की छेत्रिय पार्टियां अपना अपना घोषणा पत्र लेकर आती हैं,जिन्हे ये अच्छे मालूम है की उनके पास उतने नंबर नहीं है जिससे वे उन घोषणा पात्र की किसी भी बात पर अमल नहीं कर सकते जब तक की वो किसी न किसी पार्टी से गठबंधन न का ले, जिसका मतलब ये होता है चुनाव पूर्व ये पार्टियां अपने अपने नंबर के एक गठबंधन करेंगी और सब मिला एक कॉमन मिनिमम प्रोग्रम बनाएंगी जिसका चुनावी घोषणा पत्र से कोई लेना देना नहीं होगा, क्योंकि इन पार्टियों के इतने नंबर तो होंगे नहीं जो की गठबंधन में अपनी सारी बातें मनवा ले।
अब किसी चीज की जरुरत है तो वो है मतदाताओं की जागरूकता की, उन्हें मालूम होना चाइये की जब लोकसभा की चुनाव हो रहा हो तो छेत्रिय पार्टियों का इतना महत्व नहीं रहता और कारण साफ़ है क्योंकि उनके पास संख्या बल नहीं होता, और इस बात चुनाव में तो तस्वीर ही एकदम अलग है, सभी छोटी मोती पार्टियों का एजेंडा सिर्फ और सिर्फ मोदी को हटाना है, उनके पास कोई भी रोड मैप नहीं है जिसे वो ये बता सके वो पहले तो सरकार में आएंगे कैसे, आयंगे तो उनका नेतृत्व कौन करेगा, और अगर नेतृत्व मिल भी गया तो वो मोदी सरकार के विकास के अजेंडे को आगे कैसे बढ़ाएंगे,
अब जनता को आगे आकर राजनितिक पार्टियों से ये सवाल करने होंगे की क्यों नहीं वो सब आगे आकर दूसरा या तीसरे मोर्चे को खड़ा करे और उसके बल पर जनता से वोट डालने की अपील करे, अगर जनता उन्हें पास करके भेजती है तो वो देश कर सरकार चलाएं
जनता को सजग रहना होगा और वोट उसी को डालना होगा जो देश को आगे बढ़ाये, न की परिवार को, न की देश में फिर से दलालों का जाल फैलाये, न की देश की जनता को भिखारी बनाये,
वोट डालिये और देश बचाइए मैंने अपना चुन लिया है आप अपना चुनिए
Thursday, April 4, 2019
महागठबंधन की गणित
जैसे जैसे चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं महागठबंधन की कलाई खुलती जा रही है। जितने भी छोटे छोटे दाल हैं वो अपनी महत्वाकांछा के वशीभूत होकर चुनाव पूर्व चाहते हुए भी महागठ्बंधन में एक-दूसरे के कंधे से कन्धा मिला कर नहीं चल पा रहे हैं। इससे एक बात तो स्पष्ट है की इन दलों के राष्ट्रहित का कोई महत्व नहीं है, हुए ये सब के सब अपनी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना कहते हैं, जिसके लिए ये किसी भी हद तक जनता को बेवकूफ बना सकते हैं, राष्ट्रीय हितो के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं, ये सब जानते हुए जानता को चाइये की सजग रहे और ऐसे किसी भी लालच में आये जिससे राष्ट्र का हित खतरे में पद जाये।
आइये एक समझते हैं की आखिर ये गठबंधन का गणित है क्या
आम आदमी पार्टी जिसका अस्तित्व ही कांग्रेस की विरोद्ध के उपरांत हुआ था आज वो उसी कांग्रेस को गले लगाने के लिए लालायित है, जहाँ एक ओर दिल्ली में आप और कांग्रेस का गठबंधन नहीं हुआ, ये दोनों ही दिल्ली में एक-दूसरे को गलियां देंगे, और हरियाणा में आज भी एक-दूसरे को गले लगाने को तैयार हैं, मजे की बात ये होगी की ये दोनों ही पार्टियां चुनाव पूर्ण एक दूसरे को गालियां देंगे और अगर जनता इन्हे गलती से भी जीता कर भेज दिया तो फिर ये एक दुसरे को गले लगा लेंगे सर मोदी विरूद्ध में और सत्ता में अपनी रोटियां सेकने के लिए। लगभग यही गणित दूसरी पार्टियो का भी रहेगा आइये समझते हैं,
१- उत्तर प्रदेश - सपा-बसपा - कांग्रेस को गाली देंगे फिर चुनाव बाद सत्ता में सीट के ताकत के बल पर अपना हिस्सा मांगेगे
२- बंगाल - तृणमूल कांग्रेस - कांग्रेस के विरूद्ध लड़ेगी, राहुल को बच्चा कहेगी और चुनाव बाद सीट जयादा आये तो राहुल की माँ बनने का कोई भी मौका नहीं छोड़ेगी
३- मध्यप्रदेश / छतीशगढ/ बिहार में भी कमोवेश बुआ-बबुवा की जोड़ी भाई-बहन को गालियां देते मिलेंगे
४- आंध्रा प्रदेश - तेदेपा और कांग्रेस यहाँ भी सीट का बंटवारा नहीं कर पाए।
सबसे बड़ा सवाल ये है की ये जो पार्टियां चुनाव से पहले महागठबंधन बनाने को तैयार थी, और राष्ट्रहित की बातें करती थी क्या अचानक इनका एजेंडा राष्ट्रहित से हटकर स्वहित जा टिका, सिर्फ सत्ता में ताकत की चाहत ने ही इन पार्टियों को साथ नहीं लड़ने दिया, लेकिन मजेदार बात ये है की ये ही पार्टियां चुनाव के बाद दांत निकाल कर एक साथ खड़ी होकर जनता को मूर्ख बनाने के लिए राष्ट्रहित की बातें करेंगी।
अब जनता को ही फैंसला करना है की क्या वो महाठगबंधन के बहकावे आयेगे या मोदी जैसे की कर्मठ राजनेता को राष्ट्र का भविष्य सवारने के लिए चुनेगी
फैसला जो भी हो वोट जरूर करे नोटा के चक्कर में न फंसे क्योंकि अपने ताकत का इस्तेमाल न करना बेवकूफी कहलाती है
दाताहे की कलम से
जैसे जैसे चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं महागठबंधन की कलाई खुलती जा रही है। जितने भी छोटे छोटे दाल हैं वो अपनी महत्वाकांछा के वशीभूत होकर चुनाव पूर्व चाहते हुए भी महागठ्बंधन में एक-दूसरे के कंधे से कन्धा मिला कर नहीं चल पा रहे हैं। इससे एक बात तो स्पष्ट है की इन दलों के राष्ट्रहित का कोई महत्व नहीं है, हुए ये सब के सब अपनी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना कहते हैं, जिसके लिए ये किसी भी हद तक जनता को बेवकूफ बना सकते हैं, राष्ट्रीय हितो के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं, ये सब जानते हुए जानता को चाइये की सजग रहे और ऐसे किसी भी लालच में आये जिससे राष्ट्र का हित खतरे में पद जाये।
आइये एक समझते हैं की आखिर ये गठबंधन का गणित है क्या
आम आदमी पार्टी जिसका अस्तित्व ही कांग्रेस की विरोद्ध के उपरांत हुआ था आज वो उसी कांग्रेस को गले लगाने के लिए लालायित है, जहाँ एक ओर दिल्ली में आप और कांग्रेस का गठबंधन नहीं हुआ, ये दोनों ही दिल्ली में एक-दूसरे को गलियां देंगे, और हरियाणा में आज भी एक-दूसरे को गले लगाने को तैयार हैं, मजे की बात ये होगी की ये दोनों ही पार्टियां चुनाव पूर्ण एक दूसरे को गालियां देंगे और अगर जनता इन्हे गलती से भी जीता कर भेज दिया तो फिर ये एक दुसरे को गले लगा लेंगे सर मोदी विरूद्ध में और सत्ता में अपनी रोटियां सेकने के लिए। लगभग यही गणित दूसरी पार्टियो का भी रहेगा आइये समझते हैं,
१- उत्तर प्रदेश - सपा-बसपा - कांग्रेस को गाली देंगे फिर चुनाव बाद सत्ता में सीट के ताकत के बल पर अपना हिस्सा मांगेगे
२- बंगाल - तृणमूल कांग्रेस - कांग्रेस के विरूद्ध लड़ेगी, राहुल को बच्चा कहेगी और चुनाव बाद सीट जयादा आये तो राहुल की माँ बनने का कोई भी मौका नहीं छोड़ेगी
३- मध्यप्रदेश / छतीशगढ/ बिहार में भी कमोवेश बुआ-बबुवा की जोड़ी भाई-बहन को गालियां देते मिलेंगे
४- आंध्रा प्रदेश - तेदेपा और कांग्रेस यहाँ भी सीट का बंटवारा नहीं कर पाए।
सबसे बड़ा सवाल ये है की ये जो पार्टियां चुनाव से पहले महागठबंधन बनाने को तैयार थी, और राष्ट्रहित की बातें करती थी क्या अचानक इनका एजेंडा राष्ट्रहित से हटकर स्वहित जा टिका, सिर्फ सत्ता में ताकत की चाहत ने ही इन पार्टियों को साथ नहीं लड़ने दिया, लेकिन मजेदार बात ये है की ये ही पार्टियां चुनाव के बाद दांत निकाल कर एक साथ खड़ी होकर जनता को मूर्ख बनाने के लिए राष्ट्रहित की बातें करेंगी।
अब जनता को ही फैंसला करना है की क्या वो महाठगबंधन के बहकावे आयेगे या मोदी जैसे की कर्मठ राजनेता को राष्ट्र का भविष्य सवारने के लिए चुनेगी
फैसला जो भी हो वोट जरूर करे नोटा के चक्कर में न फंसे क्योंकि अपने ताकत का इस्तेमाल न करना बेवकूफी कहलाती है
दाताहे की कलम से
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