Tuesday, September 12, 2017

मीडिया की भेड़ चाल - असल मुद्दे से भटकाव

आजकल प्रायः देखा गया है की जैसे ही कोई ह्रदय विदारक घटना समाज में होती है तो हमारे भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ प्रेस जिसे मीडिया भी कहा जाता है अपने कैमरे लेकर सड़कों पर आ जाते हैं और उस घटना या मुद्दे को इस प्रकार से प्रसारित करने लगते हैं जैसे की वह घटना पहली बार हुई हो और उसके लिए  जो भी दोषी हो उसे उसी वक़्त २४ घंटे के भीतर सजा दे दी जाती है जिसके लिए न ही किसी तंत्र की जरुरत होती है और न ही किसी न्यायालय की और वैसे भी आजकल तो मीडिया ट्रायल का जमाना है, नो इफ नो बट फैसला ओन स्पॉट, ये तथाकथित मीडिया जो उसी सिस्टम का हिस्सा होते  हैं अचानक वही उसी सिस्टम से अपने आप को अलग कर लेता है और उसी सिस्टम को दोषी ठहरने लगता है| 
ऐसा नहीं है की ये सब इसलिए होता है की मीडिया को अचानक से समाज की फिक्र होने लगती है बल्कि उसका मुख्य कारण है उनकी TRP जो की इन्ही सब घटनाओं पर घटती बढाती रहती है और शयद एक यही चीज है जो उन्हें मुख्य विषय से भटकाता है और सिर्फ उन्हें उसी घटना विशेष पर केंद्रित रखता है जो की आज के समय में एक चिंता का विषय है|
उधारण के तौर पर लिया जाये तो राम रहीम बाबा जिसकी बनायीं गयी फिल्म का पूरा प्रोपेगेंडा मीडिया ने किया था उसने ही  बैकग्राउंड चेक के राम रहीम का माहिम मंडन किया था जब की पिछले १५ सालों से उसके ऊपर रेप का मुक़द्द्मा चला रहा था तब किसी मीडिया हाउस ने जहमत नहीं उठायी की वो राम रहीम की सल्तनत में जाये और उसका भांडा फोड़ करे लेकिन जैसे मीडिया को भरपूर मसाला मिला शुरू हो गए कैमरा लेकर की पहले मै पहले मै , किसी ने भी १५ सालो सा चल रही महिलाओं पर अत्याचार की कहानी नहीं दिखाई क्योंकि उनकी TRP नहीं बढ़ती क्योंकि देखा जाये तो देश में हर साल १०००  महिलाओं के साथ बलातकार होते है जब तक कोई सनसनी  हो खबर दिखने का क्या फायदा ?
अभी हाल की तरोताज़ा दिल को दहला देने वाली घटना जिसमे एक ७ साल के बच्चे की हत्या कर दी गयी तथ्यों का पता तो नहीं चला लेकिन की कर्मचारी ने जुर्म कबूल कर लिया है, बेशक़ इस घटना के लिए स्कूल प्रशाशन पूरी तरह से जिम्मेदार है और जिस तरह से स्कूल प्रशाशन अभिभावको का शोषण करता है उसके बदले कम से कम बच्चो को सुरक्षा तो दे ही सकता है लकिन फेल रहा ? लेकिन मेरा प्रश्न सिर्फ यहीं नहीं ख़तम होता क्या इन मीडिया हाउसेस की ये जिम्मेदारी नहीं थी वो भारत के विभिन स्कूलों की समस्याओं सा अवगत कराये ये तो फिर भी बहुत है जितना इन प्राइवेट स्कूलों ने उपलब्ध करवाया है अगर आप किसी सरकारी स्कूल की चौखट पर कदम रखें तो आप को लगेगा ही नहीं की आप ने किसी स्कूल में कदम रखा है शौचालयों की बात तो दूर है वहां आपको क्लास रूम भी नहीं मिलेंगे लेकिन शायद अगर मीडिया हाउस सरकारी स्कूलों की रपट करेंगे तो उनकी TRP टररररररररर हो जाएगी और बिना TRP के मीडिया हाउस कहाँ चलते हैं साहब ? अब इन प्राइवेट स्कूल की रिपोर्टिंग की है शायद दर स्कूल वाले ही कुछ आमदनी करा दें |
अब  समय है की जब समस्त मीडिया हाउसेस को जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए और पूरी जिम्मेदारी के साथ समाज के अंदर पल रही उन समस्याओं को उजागर करना चाहिए जिनके वजह से  समस्यांए पैदा हो रही हैं , प्रहार करना  ही है तो समस्याओं  की जड़ पर करे न की हो रही घटनाओं पर क्योँकि एक बार  जो घटना हो गयी फिर सिस्टम है उस पर खानापूर्ति करने के लिए फिर आप सड़क पर खड़े होकर कितना भी क्यों न चिल्ला ले हाँथ कुछ भी नहीं आना है

अब मीडिया को गाहेबगाहे समाज में पल रही कुरीतियों, कुसंगतियों, असहिष्णुता , असमानता, अशिक्छा , कुंठित मानसिकता पर सरकारों पर किसी घटना होने के पहले ही चाबुक चलते रहना पड़ेगा, सरकारों को उनकी कुम्भकर्णीय निंद्रा से उठते रहना होगा, नहीं तो शायद आपने वो कहावत तो सुनी ही होगी की समय निकल जाने के बाद ढपली पीटने से क्या मिल जायेगा.

Monday, September 11, 2017

सामाजिक पतन या प्रशासनिक विफलता

सामाजिक पतन या प्रशासनिक विफलता
आजकल एक फैशन सा निकल गया है जैसे ही कोई दुर्घटना होती हिअ वैसे ही हम, हमारा मीडिया, हमरा सोशल मीडिया हम सब मिल कर हल्ला मचने लगते हैं की इस देश में कुछ भी अच्छा नहीं है, पूरा  शासन भ्रस्ट हो गया है,कैसे  भारत २1वी सदी का भारत बन पायेगा जब हर दिन ना जाने कितनी महिलाओं का शासन होता है रपे होता है, महिलाएं सेफ नहीं हैं और न जाने किनते ही सवाल एक साथ थोप दिए हैं और सच पूछिए तो किसी को भी इन  जवाब से कोई मतलब नहीं होता है क्योंकि दो दिन बाद ही सारे के सारे अपने अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं या बोल कर की  हम ने एक बार ५ सालों के लिए वोट डाला है और अब समाज में हो रही किसी भी समस्या के प्रत्यछ या परोक्छा रूप सा सहकार ही जिम्मेदार है!

क्या कभी हम लोंगो ने समाज में हो रही इन दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया है की आखिर ऐसी घटनाएं हो क्यों रही है,
 क्यों किसी स्कूल के अंदर कोई भी व्यक्ति जाकर एक छोटे से मासूम बच्चे की हत्या कर देता है और कुछ ही समय में आकर ये भी कह लेता है की मैंने उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की और सफल न होने पर हत्या कर दी ?
कैसे समाज का एक बड़ा तबका किसी ढोंगी बाबा को अपना सब कुछ दे देता है यहाँ तक की अपने घर की इज्जत भी और उसके खिलाफ कोई नहीं बोल पता और जैसे ही कोर्ट ने दोषी ठहराया पूरा का पूरा बुद्धिजीवी वर्ग ज़िंदा हो गया उसे गलत या सही ठहरने के लिए ?
कैसे एक ५ साल  की बच्ची के साथ कोई आदमी रेप कर सकता है ?
कैसे समाज का एक वर्ग सिर्फ और सिर्फ सरकार के विरोध मात्र के लिए गाय जैसी पशु की निर्मम हत्या करके खुले चौराहे पर अपने खाने की आज़ादी की मांग करता है ?
कैसे किसी पत्रकार की हत्या के बाद लोग उसे सिर्फ इस लिए गालियां दे कर उसकी हत्या को सही ठहराते हैं क्योंकि उसने अपनी अभिब्यक्ति की आज़ादी का उपयोग किया था और उसके विचार कुछ लोगो के विचार से नहीं मिलते हैं ?
क्या हम लोगों ने सभी इन सब अपराधों की मूल समस्या पर विचार किया  है, की कैसे कोई किसी ५ साल के बच्चे या बच्ची को बुरी नज़र से देखता है फिर वो उसकी निर्मम हत्या भी कर देता है, क्या इसके लिए किसी सरकार ने उकसाया था , कैसे कोई लड़कियों के साथ रेप कर सकता है, कैसे कोई ढोंगी बाबा समाज के एक बड़े तबके को भ्रमित करके उनके धन दौलत और इज्जत पर डाका दाल देता है और पूरा समाज मूकदर्शक बना रहता है क्या  सरकारे इसके लिए भी उकसाती हैं ?
नहीं दरअसल हमारी सोशल इंजीनियरिंग बिगड़ गयी है , हमारा सामाजिक तानाबाना इस तरह बिगड़ गया है की लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं की क्या सही है क्या गलत है, कोई भी विषय पर समाज का दो धड़ा खड़ा हो जाता है और इक दूसरे को सही या गलत ठहरने की होड़ सी  लग जाती है, हम खुद ही अपनी ही पीढ़ी को कंफ्यूज कर रहे हैं  की क्या सही है और क्या गलत है |हमें जरुरत है अपने समाज में पल रही विसंगतियों को जड़ से ख़तम करने की, हमें जरुरत है समाज में ये सोच पैदा करने की समाज में रह रहे सभी लोगों का सामान सम्मान है चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, और हमे ही खुद एक दुसरे के सम्मान के लिए लड़ना पड़ेगा| समाज में पल रहे अन्धविश्वाश को जड़ ख़तम करने की , एक दूसरे को आगे बढ़ने का एक सामान अवसर देने का , जरुरत है किसी भी बुराई के साथ एक साथ लड़ने का|
एक बार अगर हमारे समाज ने खुद ही मदद करने की ठान ली तो सरकारों को तो एक कदम आगे बढ़कर हमारे साथ आने पर विवश होना पड़ेगा लेकिन अगर हम खुद ही उन्ही सामाजिक विसंगतियों के जीने की आदत डाल लेंगे तो माफ कीजिये फिर ऐसे ही किसी दुर्घटना के बाद चिल्लाते रहिये कुछ बदलने वाला नहीं है

Friday, September 8, 2017

Press Par Prahaar - Part 2

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Wednesday, September 6, 2017

Grinners(Reg.- 167-2010-2011: Attacks of Freedom of Speech

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अक्सर विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनितिक कार्यक्रमो में समाज के संभ्रांत वर्ग को महिला सशक्तिकरण, महिलाओं की सामाज में बनती या बिगड़ती स्थिति, अथवा पुरषो के मुकाबले महिलाओ को सामान्य अधिकार जैसी बड़ी-बड़ी बातो पर चर्चा करते पाया जाता है, और अभीष्ट वर्गो दवारा चिंता भी व्यक्त की जाती रहती है.

समय-समय पर अक्सर कभी राजनीतिक दलों दवारा, कभी संसद के पटल पर विधेयक बना कर या कभी विधेयको में संशोधन कर के महिलाओ की स्तिथि को सुधारने की एक अ-ईमानदार कोशिश जरूर की जाती रही है, और हमारी न्यापालिका भी समय समय पर अपनी विशेष टिपड़ी करके यह जरूर अभिव्यक्त किया है की वह भी महिलाओं को लेकर काफी गंभीर है. और कभी कभी तो महिलो के अधिकारों के संरझण के लिए बने प्राधिकरण भी मोर्चा आदि निकल कर ये बता देते हैं की अभी भी भारत में अभिजात्य वर्ग महिलाओ की सुरक्षा और उनके अधिकारो की सुरक्षा के लिए चिंतित है और चिंता करता रहेगा

परन्तु इन तमाम कोशिशो के बाद भी आये दिन कभी दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के वारदात दोहराये जाते हैं, गौर फरमाएगा दोहराये जाते हैं, कभी उत्तरप्रदेश में बलात्कार के बाद महिला को जला दिया जाता है, और हद तो तब हो जाती है जब की दो वर्ष की उम्र की बच्ची के साथ भी वहसियाने प्रवत्ति का परिचय दिया जाता है जिसे तो शायद ही इज्जत और बलात्कार के बीच का अंतर भी पता होगा.

हमने शायद कभी ये नहीं सोचा की बलात्कार, महिलाओं के प्रति हीन प्रवत्ति, समाज में उनके प्रति असमानता, ये सब एक प्रकार के मानसिक विकृति से जन्म लेता है, जो की जाने अनजाने कही-न-कही समाज द्वारा ही उतपन्न होता है, शुरुआत शायद घर की चौखट से भी हो सकती है, जब हम अपनी ही होनी वाली बेटी के जन्म का शोक मना रहे होते हैं, या बेटे या बेटी के बीच भेद-भाव के जरिये अपने ही पुत्र के मन में या बीज बो रहे होते है की लडकियां या महिलाये पुरषो के समकछ नहीं हो सकती, आज भी समाज का एक धड़ा अपनी ही बेटी, माँ, बहन, पत्नी को इज्जत नहीं देता जिसकी वो वास्तव में अधिकारी हों, वो समानता नहीं देता जो उनका मौलिक अधिकार है, कई बार तो घर के अंदर महियाए ही महिलाओ की इज्जत और अधिकारो की धज्जियां उड़ाती पायी जाती हैं,

आप लोगों को शायद लग रहा होगा की आज फिर किसी का बलात्कार हुआ, इसी लिए लोग अपनी-अपनी बांचने निकल पड़े, पर शायद हमें उस खबर का इंतज़ार नहीं करना चाइये की कब कोई बलातकार की खबर आये और हम शुरू हो जाए, इससे एक कदम आगे बढ़ कर हमें हमेशा तत्पर रहना होगा की हम समाज की विकृति के खिलाफ अपनी लड़ाई को अनवरत चलते रहे, जब हम ही अपनी प्रयासो को शिथिल कर देते हैं तो  इस परिवेश में हम ईमानदारी के साथ कैसे किसी राजनितिक दाल से, किसी संघटन से , किसी संवैधानिक संरचना से महिलाओ के हित, उनकी सुरक्झा, उनकी अधिकारों की बात कर सकते हैं, जब हम ही बदलने के तैयार नहीं तो समाज को कैसे बदल सकते हैं.

महिलाओ को उनकी समानता, उनके अधिकार की लड़ाई के लिए किसी के सहारे की जरुरत नहीं, अलबत्ते वो अपनी लड़ाई को अनवरत लड़ते रहे जब की एक बच्ची को पैदा होने के साथ ही उसके अधिकार स्वयं न दे दिए जाये, जब तक की मानसिक विकृता सम्पूर्ण रूप से समाप्त न हो जाये, जब तक की बच्ची के जन्म का उत्सव न मनाया जाने लगे, जब तक की हर पुरुष की नज़ारे बलात्कारी प्रवत्ति से मुक्त न हो जाये, हमारी कलम लिखती रहेगी........................................दताहे की कलम से