महागठबंधन की गणित
जैसे जैसे चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं महागठबंधन की कलाई खुलती जा रही है। जितने भी छोटे छोटे दाल हैं वो अपनी महत्वाकांछा के वशीभूत होकर चुनाव पूर्व चाहते हुए भी महागठ्बंधन में एक-दूसरे के कंधे से कन्धा मिला कर नहीं चल पा रहे हैं। इससे एक बात तो स्पष्ट है की इन दलों के राष्ट्रहित का कोई महत्व नहीं है, हुए ये सब के सब अपनी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना कहते हैं, जिसके लिए ये किसी भी हद तक जनता को बेवकूफ बना सकते हैं, राष्ट्रीय हितो के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं, ये सब जानते हुए जानता को चाइये की सजग रहे और ऐसे किसी भी लालच में आये जिससे राष्ट्र का हित खतरे में पद जाये।
आइये एक समझते हैं की आखिर ये गठबंधन का गणित है क्या
आम आदमी पार्टी जिसका अस्तित्व ही कांग्रेस की विरोद्ध के उपरांत हुआ था आज वो उसी कांग्रेस को गले लगाने के लिए लालायित है, जहाँ एक ओर दिल्ली में आप और कांग्रेस का गठबंधन नहीं हुआ, ये दोनों ही दिल्ली में एक-दूसरे को गलियां देंगे, और हरियाणा में आज भी एक-दूसरे को गले लगाने को तैयार हैं, मजे की बात ये होगी की ये दोनों ही पार्टियां चुनाव पूर्ण एक दूसरे को गालियां देंगे और अगर जनता इन्हे गलती से भी जीता कर भेज दिया तो फिर ये एक दुसरे को गले लगा लेंगे सर मोदी विरूद्ध में और सत्ता में अपनी रोटियां सेकने के लिए। लगभग यही गणित दूसरी पार्टियो का भी रहेगा आइये समझते हैं,
१- उत्तर प्रदेश - सपा-बसपा - कांग्रेस को गाली देंगे फिर चुनाव बाद सत्ता में सीट के ताकत के बल पर अपना हिस्सा मांगेगे
२- बंगाल - तृणमूल कांग्रेस - कांग्रेस के विरूद्ध लड़ेगी, राहुल को बच्चा कहेगी और चुनाव बाद सीट जयादा आये तो राहुल की माँ बनने का कोई भी मौका नहीं छोड़ेगी
३- मध्यप्रदेश / छतीशगढ/ बिहार में भी कमोवेश बुआ-बबुवा की जोड़ी भाई-बहन को गालियां देते मिलेंगे
४- आंध्रा प्रदेश - तेदेपा और कांग्रेस यहाँ भी सीट का बंटवारा नहीं कर पाए।
सबसे बड़ा सवाल ये है की ये जो पार्टियां चुनाव से पहले महागठबंधन बनाने को तैयार थी, और राष्ट्रहित की बातें करती थी क्या अचानक इनका एजेंडा राष्ट्रहित से हटकर स्वहित जा टिका, सिर्फ सत्ता में ताकत की चाहत ने ही इन पार्टियों को साथ नहीं लड़ने दिया, लेकिन मजेदार बात ये है की ये ही पार्टियां चुनाव के बाद दांत निकाल कर एक साथ खड़ी होकर जनता को मूर्ख बनाने के लिए राष्ट्रहित की बातें करेंगी।
अब जनता को ही फैंसला करना है की क्या वो महाठगबंधन के बहकावे आयेगे या मोदी जैसे की कर्मठ राजनेता को राष्ट्र का भविष्य सवारने के लिए चुनेगी
फैसला जो भी हो वोट जरूर करे नोटा के चक्कर में न फंसे क्योंकि अपने ताकत का इस्तेमाल न करना बेवकूफी कहलाती है
दाताहे की कलम से
जैसे जैसे चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं महागठबंधन की कलाई खुलती जा रही है। जितने भी छोटे छोटे दाल हैं वो अपनी महत्वाकांछा के वशीभूत होकर चुनाव पूर्व चाहते हुए भी महागठ्बंधन में एक-दूसरे के कंधे से कन्धा मिला कर नहीं चल पा रहे हैं। इससे एक बात तो स्पष्ट है की इन दलों के राष्ट्रहित का कोई महत्व नहीं है, हुए ये सब के सब अपनी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना कहते हैं, जिसके लिए ये किसी भी हद तक जनता को बेवकूफ बना सकते हैं, राष्ट्रीय हितो के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं, ये सब जानते हुए जानता को चाइये की सजग रहे और ऐसे किसी भी लालच में आये जिससे राष्ट्र का हित खतरे में पद जाये।
आइये एक समझते हैं की आखिर ये गठबंधन का गणित है क्या
आम आदमी पार्टी जिसका अस्तित्व ही कांग्रेस की विरोद्ध के उपरांत हुआ था आज वो उसी कांग्रेस को गले लगाने के लिए लालायित है, जहाँ एक ओर दिल्ली में आप और कांग्रेस का गठबंधन नहीं हुआ, ये दोनों ही दिल्ली में एक-दूसरे को गलियां देंगे, और हरियाणा में आज भी एक-दूसरे को गले लगाने को तैयार हैं, मजे की बात ये होगी की ये दोनों ही पार्टियां चुनाव पूर्ण एक दूसरे को गालियां देंगे और अगर जनता इन्हे गलती से भी जीता कर भेज दिया तो फिर ये एक दुसरे को गले लगा लेंगे सर मोदी विरूद्ध में और सत्ता में अपनी रोटियां सेकने के लिए। लगभग यही गणित दूसरी पार्टियो का भी रहेगा आइये समझते हैं,
१- उत्तर प्रदेश - सपा-बसपा - कांग्रेस को गाली देंगे फिर चुनाव बाद सत्ता में सीट के ताकत के बल पर अपना हिस्सा मांगेगे
२- बंगाल - तृणमूल कांग्रेस - कांग्रेस के विरूद्ध लड़ेगी, राहुल को बच्चा कहेगी और चुनाव बाद सीट जयादा आये तो राहुल की माँ बनने का कोई भी मौका नहीं छोड़ेगी
३- मध्यप्रदेश / छतीशगढ/ बिहार में भी कमोवेश बुआ-बबुवा की जोड़ी भाई-बहन को गालियां देते मिलेंगे
४- आंध्रा प्रदेश - तेदेपा और कांग्रेस यहाँ भी सीट का बंटवारा नहीं कर पाए।
सबसे बड़ा सवाल ये है की ये जो पार्टियां चुनाव से पहले महागठबंधन बनाने को तैयार थी, और राष्ट्रहित की बातें करती थी क्या अचानक इनका एजेंडा राष्ट्रहित से हटकर स्वहित जा टिका, सिर्फ सत्ता में ताकत की चाहत ने ही इन पार्टियों को साथ नहीं लड़ने दिया, लेकिन मजेदार बात ये है की ये ही पार्टियां चुनाव के बाद दांत निकाल कर एक साथ खड़ी होकर जनता को मूर्ख बनाने के लिए राष्ट्रहित की बातें करेंगी।
अब जनता को ही फैंसला करना है की क्या वो महाठगबंधन के बहकावे आयेगे या मोदी जैसे की कर्मठ राजनेता को राष्ट्र का भविष्य सवारने के लिए चुनेगी
फैसला जो भी हो वोट जरूर करे नोटा के चक्कर में न फंसे क्योंकि अपने ताकत का इस्तेमाल न करना बेवकूफी कहलाती है
दाताहे की कलम से
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