लोकसभा चुनाव चल रहे हैं, और हर राजनितिक पार्टी चाहती है की वो लोकसभा चुनाव जीते, चाहे वो १ सीट पर चुनाव लड़ रहे हों, या पूरे के पोरे ५४२ सीटों पर। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी पार्टियां लोकसभा में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती हैं, येन-केन-प्रकारेण मतलब किसी भी तरह से अपनी उपस्तिथि दर्ज करनी है।
छोटी-छोटी पार्टियां या निर्दलीय उम्मीदवार तो चुनाव में उतरते ही सिर्फ इस लिए हैं की या तो उन्हें बेवजह की प्रसिद्धि मिल जाये या तो वो किसी ऐसे उम्मीदवार का वोट काट सके और उनका मन-चाहा उम्मीदवार जीत सके, ये सब चुनाव में बहुत आम बात है, या यूँ कह ले की ये आम चुनाव की आम बात है, नहीं बनारस जैसे लोकसभा सीट पर जहाँ विपक्ष का कोई उम्मीदवार हार के डर से नहीं लड़ रहा हो उसी सीट पर करीब करीब १०० से अधिक लोगों ने अपना नामांकन भरा था जिन्हे शायद उनके खुद के मोहल्ले वाले भी नहीं जानते होंगे।
खैर इसमें कोई नया नहीं है, हैरानी तो होती है जब करीब १०० साल से भी पुराणी पार्टी चुनाव में उम्मीदवार सिर्फ वोट काटने के लिए उतरती है ? मतलब राजनीति में राजनितिक पार्टी अब अपने प्रतिद्वंद्वी से सीधे सीधे नहीं लड़ पा रहे हैं तो अब लड़ने की नयी तरकीब निकली है, एक ऐसा गठबंधन किया जाये जो जनता के सामने गठबंधन न लगे, मतलब जनता के सामने तो ये पार्टियां एक दुसरे को गलियां देंगी, और न जाने क्या क्या कहेंगी, लेकिन चुनाव के बाद नतीजा जो भी आये ये सारी पार्टी एक हो जाएगी और गठबंधन का नाम दे देगी।
पूरे चुनाव में विपक्ष इस तरह से कमजोर होकर चुनाव लड़ेगा इसकी अपेक्षा नहीं थी। आलम ये है की विपक्ष इतनी में भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है की एक साथ खड़ा होकर लड़ सके। पता नहीं विपक्ष आम जनता को इतना मूर्ख समझने की मूर्खता कैसे कर सकता है?
जनता को सजग रहने की जरुरत है की वोट किसे कर रहे हैं
वोट करे, और एक सशक्त सरकार चुने
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