Thursday, April 11, 2019

परंपरागत सीट वर्सेज मतदाताओं की बुद्धिमत्ता -  किसी भी सरकार की जवाबदेही से पहले हमें अपनी जवाबदेही खुद तय करनी पड़ेगी

जब भी चुनाव आते हैं तो एक बात हमेशा सुनने में आती है की, फैलाने की ये परंपरागत सीट है, यहाँ से कोई जीत ही नहीं सकता, उधाहरण के लिए ले लीजिये अमेठी जिस सालों से गाँधी परिवार का वर्चस्व है, रायबरेली वहां पर भी गाँधी परिवार सालों से जीतता आ रहा है, ये लिस्ट बहुत ही लम्बी है, और मुछे इस पचड़े में पड़ना भी नहीं है, क्योंकि मेरा मुद्दा ये नहीं है की किस पार्टी की कौन सी परंपरागत सीट है, मुद्दा यहाँ पर ये की जिस सीट पर वर्षो से एक ही पार्टी का राज रहा हो, वहां विकास की गति धीमी कैसे पड़ जाती है, आखिर वहां का मतदाता कैसे ही एक उसी पार्टी को या उम्मीदवार को वोट करता चला आता है जो की एक बार जीतने के बाद आगे के ५ साल छेत्र में आता तक नहीं और फिर ५ साल बाद जब चुनाव आता है तो वहां की जनता आखिर उसमे ऐसा क्या देखती है दुबारा चुन कर भेज देती है, यह बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है मतदाताओं की समझ पर ?

आज जब हम इक्कीसवी सदी में जी रहे है, जहाँ पर समाज में पढ़े लिखे लोगों की जमात बढ़ती जा रही है, तो क्या आज भी जब हम चुनाव में वोट डालते हैं तो हमारे पास हमारे अपने मुद्दे नहीं होते जिसके बलबूते पर हम ये निश्चित करे की जो भी राजनितिक पार्टी है वो उन मुद्दों को अपने अजेंडे में ले और उस आधार पर मतदाता अपने अधिकार का प्रयोग करके सही उम्मीदवार का चुनाव करे जो सही मायने में उस छेत्र की जनता का प्रतिनिधत्व करे और छेत्र का विकास करे। 

क्यों जब चुनाव आता है तो समाज का वो बुद्धिजीवी वर्ग मूर्खों जैसा व्यहार करता है? क्यों जब चुनाव आता है तो वोट डालते समय वो ये तय नहीं कर पता है की जिस उम्मीदवार ने ५ साल तक छेत्र का विकास नहीं किया आगे भी वो सिर्फ भाषणबाजी करके हमें अगले ५ साल के लिए मूर्ख बनाकर चला जायेगा? क्यों जब हम वोट देते हैं तो ये नहीं समझ पाते हैं की कोई वर्ग विशेष ये समुदाय विशेष किसी छेत्र अकेले विकास नहीं कर सकता, उसके लिए सभी वर्गों का सहयोग आवश्यक है? क्यों कुछ तात्कालिक लाभ के लिए देश के भविष्य या छेत्र के भविष्य के खिलवाड़ कर देते हैं?  प्रश्न ऐसे हैं जिनका जवाब हमें खुद ही देना होगा और किसी भी सरकार की जवाबदेही से पहले हमें अपनी जवाबदेही खुद तय करनी पड़ेगी, हम कैसे किसी से सवाल कर सकते हैं, जब हमारा चुनाव ही निष्पक्ष न हो ?

आवश्यकता है अब हमें जागरूक होने की, किसी भी चुनाव से पहले ये तय करने की क्या हमारा चुनाव सही है? क्या हम जिसे चुनने जा रहे हैं जो हमारी जरूरतों कोई पूरी करने की कोशिश भी करेगा ? क्या वो सछम है ?  क्या वो सिर्फ किसी परिवार में जन्मा है तो वो ही सही उम्मीदवार है ?

अब हमें जरुरत है अपने अजेंडे सेट करने की, अब मतदाता अपना भविष्य खुद तय करे, तय करे की जो चुन कर आएगा किस तरह से और कैसे छेत्र का विकास करेगा, खुद तय करे की जो उम्मीदवार चुन कर आएगा वो कितना जवाबदेह होगा और साथ ही साथ जनता अपनी जवाबदेही खुद तय करे। 

लोकतंत्र का महापर्व है, वोट करके इस पर्व को मनाये और अपने तथा अपने देश के भविस्य को सही हाथों में सौपे, मूर्ख न बने।  

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